बुधवार, 16 अगस्त 2017

अश्लील .....हरिशंकर परसाई



शहर में ऐसा शोर था कि अश्‍लील साहित्‍य का बहुत प्रचार हो रहा है। अखबारों में समाचार और नागरिकों के पत्र छपते कि सड़कों के किनारे खुलेआम अश्‍लील पुस्‍तकें बिक रही हैं।
दस-बारह उत्‍साही समाज-सुधारक युवकों ने टोली बनाई और तय किया कि जहाँ भी मिलेगा हम ऐसे साहित्‍य को छीन लेंगे और उसकी सार्वजनिक होली जलाएँगे।
उन्‍होंने एक दुकान पर छापा मारकर बीच-पच्‍चीस अश्‍लील पुस्‍तकें हाथों में कीं। हरके के पास दो या तीन किताबें थीं। मुखिया ने कहा - आज तो देर हो गई। कल शाम को अखबार में सूचना देकर परसों किसी सार्वजनिक स्‍थान में इन्‍हें जलाएँगे। प्रचार करने से दूसरे लोगों पर भी असर पड़ेगा। कल शाम को सब मेरे घर पर मिलो। पुस्‍तकें में इकट्ठी अभी घर नहीं ले जा सकता। बीस-पच्‍चीस हैं। पिताजी और चाचाजी हैं। देख लेंगे तो आफत हो जाएगी। ये दो-तीन किताबें तुम लोग छिपाकर घर ले जाओ। कल शाम को ले आना।
दूसरे दिन शाम को सब मिले पर किताबें कोई नहीं लाया था। मुखिया ने कहा - किताबें दो तो मैं इस बोरे में छिपाकर रख दूँ। फिर कल जलाने की जगह बोरा ले चलेंगे।
किताब कोई लाया नहीं था।
एक ने कहा - कल नहीं, परसों जलाना। पढ़ तो लें।
दूसरे ने कहा - अभी हम पढ़ रहे हैं। किताबों को दो-तीन बाद जला देना। अब तो किताबें जब्‍त ही कर लीं।
उस दिन जलाने का कार्यक्रम नहीं बन सका। तीसरे दिन फिर किताबें लेकर मिलने का तय हुआ।
तीसरे दिन भी कोई किताबें नहीं लाया।
एक ने कहा - अरे यार, फादर के हाथ किताबें पड़ गईं। वे पढ़ रहे हैं।
दूसरे ने कहा - अंकिल पढ़ लें, तब ले आऊँगा।
तीसरे ने कहा - भाभी उठाकर ले गई। बोली की दो-तीन दिनों में पढ़कर वापस कर दूँगी।
चौथे ने कहा - अरे, पड़ोस की चाची मेरी गैरहाजिर में उठा ले गईं। पढ़ लें तो दो-तीन दिन में जला देंगे।
अश्‍लील पुस्‍तकें कभी नहीं जलाई गईं। वे अब अधिक व्‍यवस्थित ढंग से पढ़ी जा रही हैं।.
-हरिशंकर परसाई 

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

एक अशुद्ध बेवकूफ .....हरिशंकर परसाई

बिना जाने बेवकूफ बनाना एक अलग और आसान चीज है। कोई भी इसे निभा देता है।
मगर यह जानते हुए कि मैं बेवकूफ बनाया जा रहा हूं और जो मुझे कहा जा रहा है, वह सब झूठ है- बेवकूफ बनते जाने का एक अपना मजा है। यह तपस्या है। मैं इस तपस्या का मजा लेने का आदी हो गया हूं। पर यह महंगा मजा है- मानसिक रूप से भी और इस तरह से भी। इसलिए जिनकी हैसियत नहीं है उन्हें यह मजा नहीं लेना चाहिए। इसमें मजा ही मजा नहीं है- करुणा है, मनुष्य की मजबूरियों पर सहानुभूति है, आदमी की पीड़ा की दारुण व्यथा है। यह सस्ता मजा नहीं है। जो हैसियत नहीं रखते उनके लिए दो रास्ते हैं- चिढ़ जायें या शुद्ध बेवकूफ बन जायें। शुद्ध बेवकूफ एक दैवी वरदान है, मनुष्य जाति को। दुनिया का आधा सुख खत्म हो जाए, अगर शुद्ध बेवकूफ न हों। मैं शुद्ध नहीं, 'अशुद्ध' बेवकूफ हूं। और शुद्ध बेवकूफ बनने को हमेशा उत्सुक रहता हूं।
अभी जो साहब आये थे, निहायत अच्छे आदमी हैं। अच्छी सरकारी नौकरी में हैं। साहित्यिक भी हैं। कविता भी लिखते हैं। वे एक परिचित के साथ मेरे पास कवि के रूप में आये। बातें काव्य की ही घंटा भर होती रहीं- तुलसीदास, सूरदास, गालिब, अनीस वगैरह। पर मैं 'अशुद्ध' बेवकूफ हूं, इसलिए काव्य-चर्चा का मजा लेते हुए भी जान रहा था कि भेंट के बाद काव्य के सिवाय कोई और बात निकलेगी। वे मेरी तारीफ भी करते रहे और मैं बरदाश्त करता रहा। पर मैं जानता था कि वे साहित्य के कारण मेरे पास नहीं आये।
मैंने उनसे कविता सुनाने को कहा। आमतौर पर कवि कविता सुनाने को उत्सुक रहता है, पर वे कविता सुनाने में संकोच कर रहे थे। कविता उन्होंने सुनायी, पर बड़े बेमन से। वे साहित्य के कारण आये ही नहीं थे- वरना कविता की फरमाइश पर तो मुर्दा भी बोलने लगता है।
मैंने कहा- कुछ सुनाइए।
वे बोले- मैं आपसे कुछ लेने आया हूं।
मैंने समझा ये शायद ज्ञान लेने आये हैं।
मैंने सोचा- यह आदमी ईश्वर से भी बड़ा है। ईश्वर को भी प्रोत्साहित किया जाए तो वह अपनी तुकबंदी सुनाने के लिए सारे विश्व को इकट्ठा कर लेगा।
पर ये सज्जन कविता सुनाने में संकोच कर रहे थे और कह रहे थे- हम तो आपसे कुछ लेने आये हैं।
मैं समझता रहा कि ये समाज और साहित्य के बारे में कुछ ज्ञान लेने आये हैं।
कविताएं उन्होंने बड़े बेमन से सुना दीं। मैंने तारीफ की, पर वे प्रसन्न नहीं हुए। यह अचरज की सी बात थी। घटिया से घटिया साहित्यिक सर्जक भी प्रशंसा से पागल हो जाता है। पर वे जरा भी प्रशंसा से विचलित नहीं हुए।
उठने लगे तो बोले- डिपार्टमेंट में मेरा प्रमोशन होना है। किसी कारण अटक गया है। जरा आप सेक्रेटरी से कह दीजिए, तो मेरा काम हो जाएगा।
मैंने कहा- सेक्रेटरी क्यों? मैं मन्त्री से कह दूंगा। पर आप कविता अच्छी लिखते हैं।
एक घण्टे जानकर भी मैं साहित्य के नाम पर बेवकूफ बना- मैं 'अशुद्ध' बेवकूफ हूं।
एक प्रोफेसर साहब क्लास वन के। वे इधर आये। विभाग के डीन मेरे घनिष्ठ मित्र हैं, यह वे नहीं जानते थे। यों वे मुझसे पच्चीसों बार मिल चुके थे। पर जब वे डीन के साथ मिले तो उन्होंने मुझे पहचाना ही नहीं। डीन ने मेरा परिचय उनसे करवाया। मैंने भी ऐसा बर्ताव किया, जैसे यह मेरा उनसे पहला परिचय है।
डीन मेरे यार हैं। कहने लगे- यार चलो केण्टीन में, अच्छी चाय पी जाय। अच्छा नमकीन भी मिल जाए तो मजा आ जाय।
अब क्लास वन के प्रोफेसर साहब थोड़ा चौंके।
हम लोगों ने चाय और नाश्ता किया। अब वे समझ गये कि मैं 'अशुद्ध' बेवकूफ हूं।
कहने लगे- सालों से मेरी लालसा थी कि आपके दर्शन करूं। आज यह लालसा पूर्ण हुई।(हालांकि वे कई बार मिल चुके थे। पर डीन सामने थे।)
अंग्रेजी में एक बड़ा अच्छा मुहावरा है- 'टेक इट विद ए पिंच ऑफ साल्ट'- याने थोड़े नमक के साथ लीजिए। मैंने अपनी तारीफ थोड़े नमक के साथ ले ली।
शाम को प्रोफेसर साहब मेरे घर आये। कहने लगे- डीन साहब तो आपके बड़े घनिष्ठ हैं। उनसे कहिए न कि मुझे पेपर दे दें, कुछ कांपियां भी- और 'माडरेशन' के लिए बुला लें तो और अच्छा है।
मैंने कहा- मैं ये सब काम डीन से आपके करवा दूंगा। पर आपने मुझे पहचानने में थोड़ी देर कर दी थी।
बेचारे क्या जवाब देते? अशुद्ध बेवकूफ मैं- मजा लेता रहा कि वे क्लास वन के अफसर नहीं, चपरासी की तरह मेरे पास से विदा हुए। बड़ा आदमी भी कितना बेचारा होता है।
एक दिन मई की भरी दोपहर में एक साहब आ गये। भयंकर गर्मी और धूप। मैंने सोचा कि कोई भयंकर बात हो गई है, तभी ये इस वक्त आये हैं। वे पसीना पोंछकर वियतनाम की बात करने लगे। वियतनाम में अमरीकी बर्बरता की बात कर रहे थे। मैं जानता था कि मैं निक्सन नहीं हूं। पर वे जानते थे कि मैं बेवकूफ हूं। मैं भी जानता था कि इनकी चिंता वियतनाम नहीं है।
घण्टे-भर राजनीतिक बातें हुईं।
वे उठे तो कहने लगे- मुझे जरा दस रुपये दे दीजिए।
मैंने दे दिए और वियतनाम की समस्या आखिर कुल दस रुपये में निपट गई।
एक दिन एक नीति वाले भी आ गये। बड़े तैश में थे।
कहने लगे- हद हो गयी! चेकोस्लोवाकिया में रूस का इतना हस्तक्षेप! आपको फौरन वक्तव्य देना चाहिए।
मैंने कहा- मैं न रूस का प्रवक्ता हूं न चेकोस्लोवाकिया का। मेरे बोलने से क्या होगा।
वे कहने लगे- मगर आप भारतीय हैं, लेखक हैं, बुद्धिजीवी हैं। आपको कुछ कहना ही चाहिए।
मैंने कहा- बुद्धिजीवी वक्तव्य दे रहे हैं। यही काफी है। कल वे ठीक उल्टा वक्तव्य भी दे सकते हैं, क्योंकि वे बुद्धिजीवी हैं।
वे बोले- याने बुद्धिजीवी बेईमान भी होता है?
मैंने कहा- आदमी ही तो ईमानदार और बेईमान होता है। बुद्धिजीवी भी आदमी ही है। वह सुअर या गधे की तरह ईमानदार नहीं हो सकता। पर यह बतलाईये कि इस समय क्या आप चेकोस्लोवाकिया के कारण परेशान हैं? आपकी पार्टी तो काफी नारे लगा रही है। एक छोटा सा नारा आप भी लगा दें और परेशानी से बरी हो जाएं।
वे बोले- बात यह है कि मैं एक खास काम से आपके पास आया था। लड़के ने रूस की लुमुम्बा यूनिवर्सिटी के लिए दरख्वास्त दी है। आप दिल्ली में किसी को लिख दें तो उसका सिलेक्शन हो जाएगा।
मैंने कहा- कुल इतनी-सी बात है। आप चेकोस्लोवाकिया के कारण परेशान हैं। रूस से नाराज हैं। पर लड़के को स्कालरशिप पर रूस भेजना भी चाहते हैं।
वे गुमसुम हो गए। मुझ अशुद्ध बेवकूफ की दया जाग गयी।
मैंने कहा- आप जाइए। निश्चिंत रहिए- लड़के के लिए जो मैं कर सकता हूं करूंगा।
वे चले गए। बाद में मैं मजा लेता रहा। जानते हुए बेवकूफ बनने-वाले 'अशुद्ध' बेवकूफ के अलग मजे हैं।
मुझे याद आया गुरु कबीर ने कहा था- 'माया महा ठगनि हम जानी'।

-हरिशंकर परसाई

रविवार, 13 अगस्त 2017

स्नेहमयी 'दीदी'.....हिन्दी साहित्य मंच से

महादेवी वर्मा को जब ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था, तो एक साक्षात्कार के दौरान उनसे पूछा गया था, 'आप इस एक लाख रुपये का क्या करेंगी? '

कहने लगी, 'न तो मैं अब कोई क़ीमती साड़ियाँ पहनती हूँ,  न कोई सिंगार-पटार कर सकती हूँ, ये लाख रुपये पहले मिल गए होते तो भाई को चिकित्सा और दवा के अभाव में यूँ न जाने देती, कहते-कहते उनका दिल भर आया।  कौन था उनका वो 'भाई'?  हिंदी के युग-प्रवर्तक औघड़-फक्कड़-महाकवि पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', महादेवी के मुंहबोले भाई थे।

एक बार वे रक्षा-बंधन के दिन सुबह-सुबह जा पहुँचे अपनी लाडली बहन के घर और रिक्शा रुकवाकर चिल्लाकर द्वार से बोले,  'दीदी, जरा बारह रुपये तो लेकर आना।'  महादेवी रुपये तो तत्काल ले आई, पर पूछा, 'यह तो बताओ भैय्या, यह सुबह-सुबह आज बारह रुपये की क्या जरूरत आन पड़ी?

हालाँकि, 'दीदी' जानती थी कि उनका यह दानवीर भाई रोजाना ही किसी न किसी को अपना सर्वस्व दान कर आ जाता है, पर आज तो रक्षा-बंधन है, आज क्यों?


निरालाजी सरलता से बोले, "ये दुई रुपया तो इस रिक्शा वाले के लिए और दस रुपये तुम्हें देना है। आज राखी है ना!  तुम्हें भी तो राखी बँधवाई के पैसे देने होंगे।"
ऐसे थे फक्कड़ निराला और ऐसी थी उनकी वह स्नेहमयी 'दीदी'।
प्रस्तुति करणः मनोहर वासवानी
मोबाइलः 9404825544

शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

एक छोटी सी अच्छी कहानी.... हिन्दी एरा

विडम्बना है कि आज समाज में अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए मानव कहीं भी माथा टेकने को गुरेज नहीं करता है। ऐसी ही एक कहानी जो मैंने कभी अपने पिताजी से सुनी थी आज कहीं पढ़ने को मिल गयी तो सोचा क्यों न इसे अपने ब्लॉग पर भी पोस्ट किया जाए।

किसी मजार पर एक फ़क़ीर रहते थे। सैकड़ों भक्त उस मजार पर आकर दान-दक्षिणा चढ़ाते थे। उन भक्तों में एक बंजारा भी था। वह बहुत गरीब था फिर भी नियमानुसार आकर माथा टेकता, फ़क़ीर की सेवा करता और फिर अपने काम पर जाता। उसके कपडे का व्यवसाय था, कपड़ों की भारी पोटली कन्धों पर लिए सुबह से लेकर शाम तक गलियों में फेरी लगाता। एक दिन उस फ़क़ीर को उस पर दया आ गयी, उसने अपना गधा उसे भेंट कर दिया। अब तो बंजारे की आधी समस्याएं हल हो गयी।

वह सारे कपडे गधे पर लादता और जब थक जाता तो खुद भी गधे पर बैठ जाता। यूँ ही कुछ महीने बीत गए और फिर एक दिन गधे की मौत हो गयी। बंजारा बहुत दुखी हुई, उसने उसे उचित स्थान पर दफनाया, उसकी कब्र बनायीं और फूट-फूट के रोने लगा। समीप से जा रहे किसी व्यक्ति ने जब ये देखा तो सोचा जरूर ये किसी संत की मजार होगी। तभी ये आदमी यहाँ बैठकर अपना दुःख रो रहा है।
यह सोचकर उस व्यक्ति ने कब्र पर माथा टेका और अपनी मन्नत हेतु वहां प्रार्थना की और कुछ पैसे चढ़ाकर वहां से चला गया। कुछ दिनों के उपरांत ही उस व्यक्ति की कामना पूर्ण हो गयी। उसने खुशी के मारे सारे गावं में डंका बजाया कि अमुक स्थान पर एक बहुत बड़े फ़क़ीर की मजार हैं। वहां जाकर जो अरदास करो वो पूरी  होती है। मन चाही मुरादें बख्शी जाती हैं वहां।

उस दिन से उस कब्र पर भक्तो का ताँता लगना शुरू हो गया। दूर-दराज से भक्त अपनी मुरादें बख्शाने वहां आने लगें। बंजारे की तो चांदी हो गयी, बैठे-बैठे उसे कमाई का साधन मिल गया था।

एक दिन वही फ़क़ीर, जिन्होंने बंजारे को अपना गधा भेंट स्वरुप दिया था वहां से गुजर रहे थे। उन्हें देखते ही बंजारे ने उनके चरण पकड़ लिए,”आपके गधे ने तो मेरी ज़िन्दगी बना दी। जब तक जीवित था तब तक मेरे रोजगार में मेरी मदद करता था और मरने के बाद मेरी जीविका का साधन बन गया है।”
फ़क़ीर हँसते हुए बोले,”बच्चा! जिस मजार पर तू नित्य माथा टेकने आता था वह मज़ार इस गधे के माँ की थी।”

रविवार, 6 अगस्त 2017

सुखी व्यक्ति की खोज ..... व्हाट्स एप्प से


चाँदपुर इलाके के राजा कुँवरसिंह जी बड़े अमीर थे। उन्हें किसी चीज़ की कमी नहीं थी, फिर भी उनका स्वास्थ्य अच्छा नहीं था। बीमारी के मारे वे सदा परेशान रहते थे। कई वैद्यों ने उनका इलाज किया, लेकिन उनको कुछ फ़ायदा नहीं हुआ।

राजा की बीमारी बढ़ती गई। सारे नगर में यह बात फैल गई। तब एक बूढ़े ने राजा के पास आकर कहा, ''महाराज, आपकी बीमारी का इलाज करने की मुझे आज्ञा दीजिए।'' राजा से अनुमति पाकर वह बोला, ''आप किसी सुखी मनुष्य का कुरता पहनिए, अवश्य स्वस्थ हो जाएँगे।''

बूढ़े की बात सुनकर सभी दरबारी हँसने लगे, लेकिन राजा ने सोचा, ''इतने इलाज किए हैं तो एक और सही।'' राजा के सेवकों ने सुखी मनुष्य की बहुत खोज की, लेकिन उन्हें कोई पूर्ण सुखी मनुष्य नहीं मिला। सभी लोगों को किसी न किसी बात का दुख था।

अब राजा स्वयं सुखी मनुष्य की खोज में निकल पड़े। बहुत तलाश के बाद वे एक खेत में जा पहुँचे। जेठ की धूर में एक किसान अपने काम में लगा हुआ था। राजा ने उससे पूछा, ''क्यों जी, तुम सुखी हो?'' किसान की आँखें चमक उठी, चेहरा मुस्करा उठा। वह बोला, ''ईश्वर की कृपा से मुझे कोई दुख नहीं है।'' यह सुनकर राजा का अंग-अंग मुस्करा उठा। उस किसान का कुरता माँगने के लिए ज्यों ही उन्होंने उसके शरीर की ओर देखा, उन्हें मालूम हुआ कि किसान सिर्फ़ धोती पहने हुए है और उसकी सारी देह पसीने से तर है।

राजा समझ गया कि श्रम करने के कारण ही यह किसान सच्चा सुखी है। उन्होंने आराम-चैन छोड़कर परिश्रम करने का संकल्प किया।
थोड़े ही दिनों में राजा की बीमारी दूर हो गई।"

.....व्हाट्स एप्प से
कुलदीप सिंह ठाकुर


शनिवार, 5 अगस्त 2017

तुलसी विवाह......ऋषभ आदर्श


"अरे शकरकन्द उबल गया है तो गुड़ मिला दे..हलवा जल्दी बना मुहूर्त निकल जाएगा," माँ आँगन में चावल के घोल और सिंदूर से रंगोलियाँ बनाते हुए निर्देश दे रहीं थीं।

ग्यारह वर्षीय दया अनमने भाव से कड़ाही में कड़छी घुमा रही थी। माँ ने उसे ऐसा करते देखा तो पीछे से एक चपत जमाते हुए बोली, "क्यों री समझ नहीं आती तेरे को बात? अभी तक तुलसी नहीं सजाई, ला दे कड़छी और जा तैयार हो जा।" माँ ने झिड़कते स्वर में कहा।

दया सरक कर रसोई की चौखट पर खड़ी हो गयी। उसकी आँखें डबडबाती जा रहीं थीं, माँ ने उसकी नज़रों में उतर आई बूँदों को देखा तो उसके पास आकर चिंतित स्वर में पूछा, "का हुआ दया? ऐसे काहे गुमसुम हो गयी?"

"माँ हम नहीं सजायेंगे तुलसी, हमको नहीं करना तुलसी ब्याह," सुबकते हुए दया की आवाज़ निकली।

"ऐसा काहे बोल रही? पूजा अच्छे से करेगी तो तेरा पति भी बिसनू भगवान जईसा मिलेगा ना! और जल्दी भी। तेरी गुड़िया...," माँ ने समझाया।

"हमका नहीं चाहिए बिसनू!" दया अचानक ज़ोर से बोली, फिर सिसकियाँ लेते हुए कहना शुरू किया....

"पिछला साल लछमी भी करी थी अइसने तुलसी ब्याह पूजा-पाठ फिर उसका भी ब्याह हो गया। देखो उसका गुड्डा गुड़िया भी यहीं रह गया और उ चली गयी। कोई हमरे साथ खेलने वाली सहेली भी नही अब।"

सिसकियाँ गूँज-गूँज कर माहौल में स्तब्धता फैला रहीं थीं, तुलसी भी नहीं चाहती थी कि उसे कोई अभी सजाये, मानो कह रही हो देखो मेरा "क़द" छोटा बहुत है। मैं तैयार नहीं अभी।


-ऋषभ आदर्श
सिमडेगा, झारखण्ड

शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

हथेली पर उगती फसल...डॉ. कौशल किशोर श्रीवास्तव


बड़े बाबू को घर में भी सभी बड़े बाबू कहते हैं। उन्होंने चपरासी से लेकर बड़े बाबू बनने का सफर चालीस साल में तय किया। जब वह रिटायर हुए तो घर वाले मायूस हो गये। उनकी मायूसी का कारण कम पेंशन नहीं पर टेबिल के नीचे की वह कमाई थी। जिसे ऊपरी कमाई कहते है। वह किताब बंद हाे रही थी। सब अंदाज लगा रहे थे कि जी॰ पी॰ एफ॰ में उनका कितना हिस्सा होगा पर बड़े बाबू ने यहां पेंशन ली और वहां एक पथरीली जमीन का सौदा कर डाला।

बच्चे सब निठल्ले थे अतः उन्हें सोचने का अधिकार था। उन्होंने सोचा कि बुढऊ मोटर साइकिल तो दिला नहीं रहा है, बंज़र ज़मीन खरीद रहा है। निश्चय ही सेवानिवृति के बाद बुढऊ सठिया गया है। प्रकट में बड़ा लड़का बोला "बापू आपने पूरी नौकरी एक विंटेज साइकिल में निकल दी अब मोटर साइकिल खरीद लेते तो सबको सुविधा हो जाती।"
बड़े बाबू बोले "अगले साल फसल आने पर सबको सब कुछ दिला दूंगा।
छोटा बोला बापू तू पक्के में सतिया गया है। उस बंजर पथरीली ज़मीन में फसल कैसे उगेगी।

बड़े बाबू बोले "बेटों बुद्धिमान लोगों कि फसल ज़मीन में नहीं उगती है। दोनों बेटे चुप हो गए। बड़ा सोचने लगा बुड्ढा घाघ ताे है। पूरी नौकरी में चौबीस घंटे बदमाश रहा है। हो सकता है कि किसी गुंताड़े में हो। एक साल इंतजार करने में कोई हर्ज नहीं है। कौन ये एक साल में मरा जा रहा है।

दूसरे दिन बड़े बाबू बोले इंश्योरेंस कंपनी के ऑफिस गये। वहां सब व्यस्तता का नाटक कर रहे थे। सब फंदा डाले बटेराें का इंतज़ार कर रहे थे। बड़े बाबू ने एक एजेंट से पूछा "मुझे फसल का बिमा करवाना है। मुझे किससे मिलना चाहिए।
आपको मुझसे ही मिलना चाहिए बल्कि मुझे ही आपसे मिलना चाहीये। चलिए फसल का मुआयना कर लिया जाये। बड़े बाबू बोले बॉस मई अपनी गाड़ी लेकर आता हूँ। आप पांच मिनट रुके।"

वह एजेंट बोला - "मुझे टॉयलेट जाना होता है तो पांच मिनट रुक भी सकता था। बिमा जैसी महत्वपूर्ण क्रिया में तो एक क्षण भी व्यर्थ नहीं गवां सकता। आप मेरी कार से आपकी फसल का मुआयना करा दिजिए।"

बड़े बाबू उसकी कार में बैठ कर उनके खेत में ले गए जहां पत्थर पड़े थे। एजेंट ने भौचक होकर पूछा "फसल कहां है जिसका बीमा होना है।" बड़े बाबू ने कहाँ देखिये क्षितिज तक फसल लहलहा रही है। जरा आपका हाथ तो आगे कीजिये - एजेंट समझ गया कि बड़े बाबू बगैर बीज बोये फसल लहलहाना चाहते है। उसने पैंट के बाजू से पोंछ कर हाथ आगे कर दिया। बड़े बाबू ने रूपये दस हजार उसकी हथेली पर रख दिए। एजेंट खुश होकर बोला "अरे हां, फसल तो यहां से वहां तक लहलहा रही है।" माफ करना मैंने चश्मा नही लगाया था। पर फसल में आग एक माह के पहले मत लगाना।

बड़े बाबू ने ऐसा ही किया। फिर एक माह बाद फसल नष्ट होने की बीमे की राशि पांच लाख रुपये पत्नी के हाथो में रख दी। बेटों को उनके मन के सढियाने के बजाय आदर सूचक भाव आ गये।
इसके बाद बड़े बाबू एक राष्ट्रीयकृत बैंक के प्रबंधक के पास गये। उससे खड़े-खड़े ही निवेदन किया ""सर मुझे खेत में कुआं खुदवाने, बीज और खाद के लिए ऋण चाहिए।"

मैनेजर खड़ा हाे गया और बाेला - "बैठिये सर मैंने सोचा कि आप खाता खुलवाने के लिए आये है। आप खेत के कागजात तो लाये है। आजकल सरकार किसानो के पांच लाख तक के ऋण माफ़ कर रही है। ऋण ग्राहक हमारे लिए महत्वपूर्ण व्यक्ति है। ऐसा महात्मा गांधी ने कहां है।"

महात्मा गांधी डॉक्टरों को मरीज दुकानदारों एंव बैंको को ग्राहक महत्वपूर्ण व्यक्ति बतला गये है। महात्मा जी कह गए है कि ग्राहक हमे सेवा का अवसर प्रदान कर अनुग्रहित करता है। हम उस पर निर्भर है। तनखा पर नहीं।

बड़े बाबू ने बैंक मैनेजर के हाथो में कुआं खाैदा, बीज बाेये और खाद डाली। यह सब काम दस हजार रूपये में हो गये। बड़े बाबू दस हजार रूपयो से पांच लाख रूपये खरीद कर घर ले आ गये। अब उनकी बीबी और बेटों ने उनके चरण छूकर आशीर्वाद मांगा। माँ लक्ष्मी के काैन चरण न छूना चाहेगा। बस फर्क इतना था कि साड़ी पहनने के बजाय बड़े बाबू पैंट शर्ट पहने थे।

अब पटवारी साहब कि बरी थी, सरकार ने उन्हें इतने काम दे रखें है, कि वे जमीं के कागजात देखकर कुर्सी पर बैठे-बैठे ही पंद्रह किलोमीटर दूर जाकर मुआयना कर देते है। उन्होंने भी दस हजार रूपये लेकर उस पथरीली ज़मीन पर फसल लहलहा दी और बड़े बाबू से अतिवृष्टि या अनावृष्टि का इंतज़ार करने को कहा।

इन सबके बेईमानियाें की भरपाई सरकार हमारी जेब में उसका ताला लगाकर कर रही है। जहां पहले फिक्स्ड डिपाजिट पर नाै प्रतिशत ब्याज मिलता था। अब वह घट कर छः प्रतिशत रह गया। हम माह में तीन बार से ज्यादा पैसा निकल नहीं सकते। हमारे एकाउंट में यदि जी. पी. एफ. के दस लाख भी जमा करते है ताे दाे लाख से ज्यादा निकाल नहीं सकते है। सरकार ने किसानों को भिखारी बना दिया है। सरकार कहती है कि - वह बेईमानों का पैसा बाहर निकलवा कर रहेगी। अब देश में ईमानदारों के आलावा काैन बेईमान बचा है।

समूह योजना में पैसे बांटे जा रहे है। आज़ादी के पैंसठ साल बाद भी एक गरीबी रेखा नामक रेखा है, जिसके ऊपर के लाेग गरीब हाेते जा रहे है। पट्टों के नाम पर ज़मीन की लूटमारी हो रही है। जिनके पास महंगे मोबाइल, मोटर साइकिल है। उन्हें फर्जी कार्ड के आधार पर मुफ्त के मकान दिए जा रहे है।

आज प्रजातंत्र में तंत्र बहुत अधिक मज़बूत हो गया है। और प्रजा बहुत अधिक कमज़ोर हो गई है। नौकरों को लाखों रूपये तनख्वाह मिलती है। और प्रजा या तो भीख़ मांग रही है या भूखों मर रही है।



-डॉ.कौशल किशोर श्रीवास्तव

गुरुवार, 3 अगस्त 2017

वो दिखा तो कुछ न बात किया......हिन्दी साहित्य मंच से

रातभर जिसने मुझे याद किया
वो दिखा तो कुछ न बात किया

आज भी उसने बड़ी खामोशी से
जाने क्या-क्या फरियाद किया

टिमटिमाती हुई दो आंखों से
कुछ सितारों को बर्बाद किया

बांधकर हमसे अपने दिल को
उसने हमको आजाद किया 
...हिन्दी साहित्य मंच से

बुधवार, 2 अगस्त 2017

टूटा पहिया....धर्मवीर भारती



मैं
रथ का टूटा पहिया हूँ
लेकिन मुझे फेंकों मत
क्या जाने कब
इस दुरूह चक्रव्यूह में
अक्षौहिणी सेनाओं को चुनौती देता हुआ
कोई दुस्साहसी अभिमन्यु घिर जाए?
अपने पक्ष को असत्य जानते हुए भी
बड़े- बड़े महारथी
अकेली निहत्थी आवाज को
अपने ब्रह्मास्त्रों से कुचल देना चाहें

तब मैं
रथ का टूटा पहिया
उसके हाथों में
ब्रह्मास्त्रों से लोहा ले सकता हूँ !
मैं रथ का टूटा पहिया हूँ
लेकिन मुझे फेंको मत
इतिहासों की सामूहिक गति
सहसा झूठी पड़ जाने पर
क्या जाने
सच्चाई टूटे हुए पहियों का आश्रय ले!


- धर्मवीर भारती