शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

एक सही सोच....अखण्ड ज्याति से


कार से उतरकर भागते हुए हॉस्पिटल में पहुंचे नौजवान बिजनेस मैन ने पूछा..

“डॉक्टर, अब कैसी हैं माँ?“ हाँफते हुए उसने पूछा।

“अब ठीक हैं। माइनर सा स्ट्रोक था। ये बुजुर्ग लोग उन्हें सही समय पर लें आये, वरना कुछ बुरा भी हो सकता था। “ 

डॉ. ने पीछे बेंच पर बैठे दो बुजुर्गों की तरफ इशारा कर के जवाब दिया।

“रिसेप्शन से फॉर्म इत्यादि की फार्मैलिटी करनी है अब आपको।” डॉ. ने जारी रखा।

“थैंक यू डॉ. साहब, वो सब काम मेरी सेक्रेटरी कर रही हैं“ अब वो रिलैक्स था।

फिर वो उन बुजुर्गों की तरफ मुड़ा.. “थैंक्स अंकल, पर मैनें आप दोनों को नहीं पहचाना।“ 

“सही कह रहे हो बेटा, तुम नहीं पहचानोगे क्योंकि हम तुम्हारी माँ के वाट्सअप फ्रेंड हैं ।” एक ने बोला।

“क्या, वाट्सअप फ्रेंड ?” चिंता छोड़ , उसे अब, अचानक से अपनी माँ पर गुस्सा आया।

“60 + नॉम का  वाट्सप ग्रुप है हमारा।” “सिक्सटी प्लस नाम के इस ग्रुप में साठ साल व इससे ज्यादा उम्र के लोग जुड़े हुए हैं। इससे जुड़े हर मेम्बर को उसमे रोज एक मेसेज भेज कर अपनी उपस्थिति दर्ज करानी अनिवार्य होती है, साथ ही अपने आस पास के बुजुर्गों को इसमें जोड़ने की भी ज़िम्मेदारी दी जाती है।”

“महीने में एक दिन हम सब किसी पार्क में मिलने का भी प्रोग्राम बनाते हैं।”

“जिस किसी दिन कोई भी मेम्बर मैसेज नहीं भेजता है तो उसी दिन उससे लिंक लोगों द्वारा, उसके घर पर, उसके हाल चाल का पता लगाया जाता है।”

आज सुबह तुम्हारी माँ का मैसेज न आने पर हम 2 लोग उनके घर पहुंच गए..।

वह गम्भीरता से सुन रहा था। “पर माँ ने तो कभी नहीं बताया।" उसने धीरे से कहा।

“माँ से अंतिम बार तुमने कब बात की थी बेटा? क्या तुम्हें याद है ?” एक ने पूछा।

बिज़नेस में उलझा, तीस मिनट की दूरी पर बने माँ के घर जाने का समय निकालना कितना मुश्किल बना लिया था खुद उसने।

हाँ पिछली दीपावली को ही तो मिला था वह उनसे गिफ्ट देने के नाम पर।

बुजुर्ग बोले..  “बेटा, तुम सबकी दी हुई सुख सुविधाओं के बीच, अब कोई और माँ या बाप अकेले घर मे कंकाल न बन जाएं... बस यही सोच ये ग्रुप बनाया है हमने। वरना दीवारों से बात करने की तो हम सब की आदत पड़ चुकी है।”

उसके सर पर हाथ फेर कर दोनों बुज़ुर्ग अस्पताल से बाहर की ओर निकल पड़े। नवयुवक एकटक उनको जाते हुए देखता ही रह गया।

अगर ये आपको कुछ सीख दे तो कृपया किसी और को भी भेजने में संकोच ना करे?
-अखण्ड ज्याति से

रविवार, 29 अक्तूबर 2017

10 Powerful words that inspire a vision

Regardless of your circumstances, life is full of surprises, setbacks and disappointments, which could result in loss of momentum for your business. 
Boost your confidence with these powerful words 
when ever you feel it necessary.

Purpose
It all starts with a dream that builds up inside, which molds itself into a powerful purpose. Whenever you feel discouraged or loose your direction, remind yourself of the original reason why you started this great venture.



Planning. 
Try to visit your original plan of action, fine tuning it as you eliminate time-wasting frustrations. Remain focused by documenting your thoughts in detail as this will become the visual, which you can use to add to the planning process with renewed momentum.


Accepting. 
Accept the fact that you are perfectly imperfect and that human error, ups and downs are part of the process. Know that the true learning curve is in the mistakes we make. Without this self-acceptance, you will be putting yourself under un-necessary pressure. Remember that diamonds are created under pressure.



Reward. 
Give yourself on-going rewards along the way to keep your motivation levels up and to celebrate small, but crucial successes. These rewards refresh and remind you of what you are working for, building momentum as you drive forward. How do you eat a cow? One bite at a time!

 Health. 
A balanced lifestyle, in all aspects, is what is required to pursue your goals with the vigor and passion that you will have started out with. This can be broken down to exercise, diet, sleep, relaxation etc. Care take the basics and the rest falls into place.

Motivation. 
Motivation comes in many forms – different strokes for different folks. Find a source that inspires you to make your dream a reality. Keep your motivational source close at hand to keep you at the level of activity that you want. If you get discouraged, tap into your source before it gets the better of you. Some people find that a little pressure is all the motivation they need.


Organization. 
The word says it all – an organization needs to be organized. This gives one the clarity to focus on the job at hand. A clean desk for example, with a fresh new system is all one needs to move to the next level of productivity. Constantly attempt to create a sense of clarity.




Refresh. 
Refreshing your plan from time to time sparks new, innovative ideas that you can test on your business. Regardless of what it is, break out of the pattern you are in and try something different. If your new tactics don’t yield positive results in the short term, at the very least it will highlight your options moving forward. Re-inventing yourself keeps the competition guessing!





Networking. 
“Always on duty” should be your approach to networking. Tell people who you know and meet what you do and how passionate you are about it. Networking is key to your success as you build relationships. The best results come from people speaking to other people about your business. People believe more of what they hear, and less of what they read.


Action. 
Nike said it best with their slogan – just do it! Now is the time to take action to go and turn your goals into reality. If any pessimistic thoughts enter your mind, 
you will immediately eliminate the negative impact by doing something proactive.




Regularly peruse these powerful words to keep yourself up and running. Remember that energy is contagious, regardless of whether it’s positive or negative. 
The choice is yours…
.........Diggi

बुधवार, 25 अक्तूबर 2017

ये सूर्य मंदिर है 1 लाख 50 हजार साल पुराना


बिहार के औरंगाबाद जिले का देव सूर्य मंदिर सूर्योपासना के लिए सदियों से आस्था का केंद्र बना हुआ है। ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टिकोण से विश्व प्रसिद्ध त्रेतायुगीन इस मंदिर परिसर में प्रति वर्ष चैत्र और कार्तिक माह में महापर्व छठ व्रत करने वालों की भीड़ उमड़ पड़ती है।

पश्चिमाभिमुख देव सूर्य मंदिर की अभूतपूर्व स्थापत्य कला इसकी कलात्मक भव्यता दर्शाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसका निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने स्वयं अपने हाथों से किया। काले और भूरे पत्थरों से निर्मित मंदिर की बनावट उड़ीसा के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर से मिलती-जुलती है।
मंदिर के निर्माणकाल के संबंध में मंदिर के बाहर लगे एक शिलालेख के मुताबिक, 12 लाख 16 हजार वर्ष त्रेता युग के बीत जाने के बाद इला पुत्र ऐल ने देव सूर्य मंदिर का निर्माण आरंभ करवाया था। शिलालेख से पता चलता है कि इस पौराणिक मंदिर का निर्माण काल एक लाख पचास हजार वर्ष से ज्यादा हो गया है।
देव मंदिर में सात रथों से सूर्य की उत्कीर्ण प्रस्तर मूर्तियां अपने तीनों रूपों उदयाचल, मध्याचल और अस्ताचल सूर्य के रूप में विद्यमान हैं। पूरे भारत में सूर्य देव का यही एक मंदिर है जो पूर्वाभिमुख न होकर पश्चिमाभिमुख है। इस मंदिर परिसर में दर्जनों प्रतिमाएं हैं। मंदिर में शिव की जांघ पर बैठी पार्वती की दुर्लभ प्रतिमा है।
करीब एक सौ फीट ऊंचा यह सूर्य मंदिर स्थापत्य और वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण है। बिना सीमेंट के प्रयोग किए आयताकार, वर्गाकार, गोलाकार, त्रिभुजाकार आदि कई रूपों और आकारों में काटे गए पत्थरों को जोड़कर बनाया गया। यह मंदिर अत्यंत आकर्षक है।
देव सूर्य मंदिर दो भागों में बना है। पहला गर्भ गृह जिसके ऊपर कमल के आकार का शिखर है और शिखर के ऊपर सोने का कलश है। दूसरा भाग मुखमंडप है, जिसके ऊपर पिरामिडनुमा छत और छत को सहारा देने के लिए नक्काशीदार पत्थरों का बना स्तंभ है।

तमाम हिंदू मंदिरों के विपरीत पश्चिमाभिमुख देव सूर्य मंदिर ‘देवार्क’ माना जाता है जो श्रद्धालुओं के लिए सबसे ज्यादा फलदायी एवं मनोकामना पूर्ण करने वाला है। जनश्रुतियों के आधार पर इस मंदिर के निर्माण के संबंध में कई किंवदतियां प्रसिद्ध हैं, जिससे मंदिर के अति प्राचीन होने का स्पष्ट पता तो चलता है, लेकिन इसके निर्माण के संबंध में अब भी भ्रामक स्थिति बनी हुई है।

सर्वाधिक प्रचारित जनश्रुति के अनुसार, ऐल एक राजा थे, जो श्वेत कुष्ठ रोग से पीड़ित थे। एक बार शिकार करने देव के वनप्रांत में पहुंचने के बाद राह भटक गए। राह भटकते भूखे-प्यासे राजा को एक छोटा सा सरोवर दिखाई पड़ा, जिसके किनारे वे पानी पीने गए और अंजलि में भरकर पानी पिया।

पानी पीने के क्रम में वह यह देखकर घोर आश्चर्य में पड़ गए कि उनके शरीर के जिन जगहों पर पानी का स्पर्श हुआ, उन जगहों के श्वेत कुष्ठ के दाग चले गए। शरीर में आश्चर्यजनक परिवर्तन देख प्रसन्नचित राजा ऐल ने यहां एक मंदिर और सूर्य कुंड का निर्माण करवाया था।
भगवान भास्कर का यह मंदिर सदियों से लोगों को मनोवांछित फल देनेवाला पवित्र धर्मस्थल है। ऐसे यहां सालभर देश के विभिन्न जगहों से लोग आकर मन्न्त मांगते हैं और सूर्य देव द्वारा इसकी पूर्ति होने पर अर्घ्य देने आते हैं। छठ पर्व के दौरान यहां लाखों लोग जुटते हैं।
उल्लेखनीय है कि यहां छठ पर्व करने आने वाले लोगों में न केवल बिहार और झारखंड के लोग होते हैं। बल्कि बिहार के आस-पास के राज्यों के लोगों के साथ विदेशों से भी लोग यहां सूर्योपासना के लिए पहुंचते हैं।

रविवार, 22 अक्तूबर 2017

ओल्ड इज़ गोल्ड ....बुजुर्ग भी इंसान है...........डॉ. आलोक चान्टिया

 कितनी अजीब बात है कि हर मनुष्य का जन्मदिन अलग अलग होता है पर कुछ बाते ऐसी होती है कि सभी में सामान होती है और इसी लिए साडी दुनिया के बुजुर्गों के लिए एक दिन रख दिया गया | मैं उन मनीषियों को साधुवाद देता हूँ जिन्होंने १ तारीख को चुना क्योकि आज दुनिया में हर बुजुर्ग अकेला ( एक ) होकर रह गया है | न जाने कौन सा दर्शन है कि बच्चा पेट में भी होता है तो हर कोई उसके आने की प्रतीक्षा करता है और दुनिया में आने के बाद तो पूछिये ही मत | बच्चा रोया तो सब लपके | बच्चा श तो सब हसे , कौन ऐसा है जो बच्चे को चूमता न हो , गोद में ना उठा लेता हो , उसके लिए कुछ लता न हो और माँ के छटी से तो अमृत ही बरास्ता रहता है पर क्या हो जाता है जब वही बच्चा एक दिन बूढ़ा होता है , क्यों नहीं किसी के पास समय होता है तब उस बढे के लिए !!!!!!!!!!! क्या इसका मतलब मैं ये समझू कि दुनिया ही मोल भाव पर आधारित है जब बच्चा होता है तो लोग उसे कच्चे माल की तरह देखते है क्योकि उसमे कल की सम्भावनाये छिपी है इस लिए हर कोई बच्चे पर लूटना चाहता है पर जब बुजुर्ग की बारी आती है तो दुनिया को लगता है कि अब ये वेस्ट मटेरियल है \ दुनिया को कुछ देने से रहे और जो देना चाहते है उसके सहारे आज के समाज में कोई एक दिन चल नहीं सकता और ऊपर से दवा में पैसा खर्च अलग होगा |और हम लोग वैसे भी जुआ खेल सकते है , दारू पी सकते है पर उस बुजुर्ग पर पैसा क्यों खर्च करें जिससे कोई सुख ही नहीं मिल सकता | मैं महिला पर बनने वाले कानून का घोर समर्थक हूँ पर जिस तरह से घरेलु हिंसा के अधिनियम में महिला को अधिकार दिया गया है कि वो चाहे तो अलग रह सकती है उसके कारण आज बहु अपने सास ससुर को एक रोटी बना कर देना पसंद नहीं करती| जिस देश में खाना बनते समय गाये और कुत्ते के लिए रोज रोटी बनाने का रिवाज था उसी देश में हमारे बुजुर्ग एक रोटी को तरस जाते है | शायद हम इतने यथार्थ में जीने लगे है कि हम मान चुके है कि जिसके भाग्य में जो लिखा है वही मिलता है और जब बुजुर्गों  को ठोकर खाकर मारना लिखा है कलयुग में तो बेचारे भारतीय करें भी क्या ? और तो और अब उनको उम्र कहा रही जो परिवार के साथ रहे उनकी उम्र की बातें कौन करें | ये तो इस देश के मातृ पितृ भक्त बच्चो की सहृदयता है कि बूढ़े माता पिता को अकेला पन ना लगे तो उनको वृद्धाश्रम में रखवा देते है कम से कम वह उनको उम्र के लोगो के बीच उनका समय तो कट जाता है | अब बूढी अम्मा को कौन हाथ पकड़ कर घुमाए ? कहा इतनी फुर्सत किसी के पास वो क्या कम है कि वॉकर लाके दे दिया है कम से कम किसी से कहना तो नहीं पड़ता कि घुमा दो| पर उसी माँ ने गहनता अपने बच्चे के पैर बचपन में इस लिए दबाये होंगे क्योकि उसने खेल कर आने के बाद कहा होगा मम्मी पैर में बहुत दर्द है | पापा यानि अप्पकी नज़र में बुजुर्ग जो अब किसी काम के नहीं ऊपर से रात भर खासते रहते है , सबकी नींद हराम किये रहते है वो अलग | उनकी क्या मजाल जो अपने इलाज के पैसे पा जाये पर जब आपको पढ़ाई करने के लिए उनकी हैसियत से बड़े स्कूल में जाने के लिए इच्छा हुई होगी तो उन्होंने अपने दोस्त से या बैंक से या अपनी पेंशन बेच कर या फिर अपनी जमीन बेच कर आपको इस मुकाम तक पहुचाया होगा क्योकि उनके लिए आखिर किस दिन के लिए पैसा होता है जब बच्चे ही अपनी मर्जी का कुछ ना कर पाये तो क्या फायदा पर आपके पास उनके इस त्याग को सोचने का कहा वक्त ??? कौन सा कोई अनोखा काम कर दिया सभी माँ बाप करते है और आज वही पेंशन बेचने वाला बाप अपनी दवाई को तरसता है तो तरसे पिछले जन्म में जरूर कोई पाप किया होगा जो इस जन्म में ऐसा दिन देख रहे है | वो तो भला हो इस देश  कीसरकार का जिसने वृद्धो के भरण पोषण के लिए २००७ में कौन बना दिया और ये व्यवस्था कि जो कोई भी किसी माँ पिता या वृद्ध जन की संपत्ति और बच्चे होने का हक़ रखता है उसको अपने वृद्ध माता पिता को जीविकोपार्जन के लिए १०००० रुपये तक गुजारा भत्ता देना होगा | चलिए सरकार ने ही आपको याद तो दिलाया कि आप जिनके कारण इस दुनिया में है उनको आप यु ही नहीं छोड़ सकते | आप मंदिर में भगवन को प्रसाद चढ़ा सकते है | गरीबों को दान दे सकते है पर क्या मजाल जो इस दुनिया में लेन वाले को आप कुछ दे दें | मुझे नहीं मालूम कि आप मेरी बातों से कितना सहमत है पर दुनिया में औरतों को समानता का अधिकार दिलाने केलिए आप आंदोलन करते है | सभी के समान होने ई वकालत आप करते है | अमेरिका के गोर काले का भेद मिटाने केलिए आवाज आप उठाते है | पर सच सोच कर देखिये क्या आप अपने ही घर में अपने बूढो या माता पिता को अपने समान समझ पाये ???? उनको वही देने के लिए आप प्रयास कर पाये जो उन्होंने आपको देने के लिए किये   थे!!!!!!!! शायद नहीं इसी लिए वृद्धो के भरण पोषण पर कानून लाना पड़ा , वृद्धा आश्रम बनवाना पड़ा | वृद्ध दिवस मानना पड़ा | तो फिर इस देश में गणेश पूजा क्यों ????????जब आप गणेश के उस दर्शन को ही नहीं अपना पाये जिसमे वो सिर्फ अपने माँ पिता के चारों और चक्कर काट कर देवताओं में प्रथम देवता बन गया | आप राम क्यों पूजते है जब वही राम अपनी माँ और पिता की इच्छा के लिए वनवास चले गए आप तो कोई त्याग ही नहीं करना चाहते |आप औरंगजेब क्यों बनना चाहते है जिसने अपने बूढ़े बाप को जेल में डाल दिया | आप आलुद्दीन ख़िलजी क्यों बनना चाहते है जिसने सत्ता के लिए अपने बुजुर्ग चाचा जलालुद्दीन खिलजो को कड़ा में खंजर घोप कर मार डाला | ये सारे उदहारण है ना कि किसी धर्म का विश्लेषण पर आपको सोचना चाहिए कि क्या हम कभी बूढ़े नहीं होंगे !!!!!!!!! होंगे पर जरुरी नहीं कि बार बार यही कहानी दोहराइए जाये आइये एक बार उन बुड्ढे माँ पिता की सेवा करें जिनके कारण हम गणेश और दुर्गा को जानने के लिए दुनिया में आ पाये | 
-डॉ. आलोक चान्टिया , अखिल भारतीय अधिकार 

गुरुवार, 19 अक्तूबर 2017

संत की संगति का परिणाम


एक जंगल में एक संत अपनी कुटिया में रहते थे।
एक किरात (शिकारी), जब भी वहाँ से निकलता संत को प्रणाम ज़रूर करता था।

एक दिन किरात संत से बोला की बाबा मैं तो मृग का शिकार करता हूँ,
आप किसका शिकार करने जंगल में बैठे हैं.?
संत बोले - श्री कृष्ण का, और फूट फूट कर रोने लगे।

किरात बोला अरे, बाबा रोते क्यों हो ?
मुझे बताओ वो दिखता कैसा है ? मैं पकड़ के लाऊंगा उसको।

संत ने भगवान का वह मनोहारी स्वरुप वर्णन कर दिया....
कि वो सांवला सलोना है, मोर पंख लगाता है, बांसुरी बजाता है।

किरात बोला: बाबा जब तक आपका शिकार पकड़ नहीं लाता, पानी भी नही पियूँगा।

फिर वो एक जगह जाल बिछा कर बैठ गया...
3 दिन बीत गए प्रतीक्षा करते करते, दयालू ठाकुर को दया आ गयी, वो भला दूर कहाँ है,

बांसुरी बजाते आ गए और खुद ही जाल में फंस गए।

किरात तो उनकी भुवन मोहिनी छवि के जाल में खुद फंस गया और एक टक शयाम सुंदर को निहारते हुए अश्रु बहाने लगा,
जब कुछ चेतना हुयी तो बाबा का स्मरण आया और जोर जोर से चिल्लाने लगा शिकार मिल गया, शिकार मिल गया, शिकार मिल गया,

और ठाकुरजी की ओर देख कर बोला,

अच्छा बच्चू .. 3 दिन भूखा प्यासा रखा, अब मिले हो,
और मुझ पर जादू कर रहे हो।

शयाम सुंदर उसके भोले पन पर रीझे जा रहे थे एवं मंद मंद मुस्कान लिए उसे देखे जा रहे थे।

किरात, कृष्ण को शिकार की भांति अपने कंधे पे डाल कर और संत के पास ले आया।

बाबा,
आपका शिकार लाया हूँ... बाबा ने जब ये दृश्य देखा तो क्या देखते हैं किरात के कंधे पे श्री कृष्ण हैं और जाल में से मुस्कुरा रहे हैं।

संत के तो होश उड़ गए, किरात के चरणों में गिर पड़े, फिर ठाकुर जी से कातर वाणी में बोले -

हे नाथ मैंने बचपन से अब तक इतने प्रयत्न किये, आप को अपना बनाने के लिए घर बार छोडा, इतना भजन किया आप नही मिले और इसे 3 दिन में ही मिल गए...!!

भगवान बोले - इसका तुम्हारे प्रति निश्छल प्रेम व कहे हुए वचनों पर दृढ़ विश्वास से मैं रीझ गया और मुझ से इसके समीप आये बिना रहा नहीं गया।

भगवान तो भक्तों के संतों के आधीन ही होतें हैं।

जिस पर संतों की कृपा दृष्टि हो जाय उसे तत्काल अपनी सुखद शरण प्रदान करतें हैं। किरात तो जानता भी नहीं था की भगवान कौन हैं,
पर संत को रोज़ प्रणाम करता था। संत प्रणाम और दर्शन का फल ये है कि 3 दिन में ही ठाकुर मिल गए ।

यह होता है संत की संगति का परिणाम!!
"संत मिलन को जाईये तजि ममता अभिमान, 
ज्यो ज्यो पग आगे बढे कोटिन्ह यज्ञ समान
दीपावली की शुभ कामनाएँ

शुक्रवार, 13 अक्तूबर 2017

संवेदनशीलता....व्हाट्स एप्प से


मोहन काका डाक विभाग के कर्मचारी थे। बरसों से वे माधोपुर और आस पास के गाँव में चिट्ठियां बांटने का काम करते थे।


एक दिन उन्हें एक चिट्ठी मिली, पता माधोपुर के करीब का ही था लेकिन आज से पहले उन्होंने उस पते पर कोई चिट्ठी नहीं पहुंचाई थी।

रोज की तरह आज भी उन्होंने अपना थैला उठाया और चिट्ठियां बांटने निकला पड़े। सारी चिट्ठियां बांटने के बाद वे उस नए पते की ओर बढ़ने लगे।......दरवाजे पर पहुँच कर उन्होंने आवाज़ दी, “पोस्टमैन!”

अन्दर से किसी लड़की की आवाज़ आई, “काका, वहीं दरवाजे के नीचे से चिट्ठी डाल दीजिये।”

“अजीब लड़की है मैं इतनी दूर से चिट्ठी लेकर आ सकता हूँ और ये महारानी दरवाजे तक भी नहीं निकल सकतीं !”, काका ने मन ही मन सोचा।


“बाहर आइये! रजिस्ट्री आई है, हस्ताक्षर करने पर ही मिलेगी!”, काका खीजते हुए बोले।

“अभी आई।”, अन्दर से आवाज़ आई।

काका इंतज़ार करने लगे, पर जब 2 मिनट बाद भी कोई नहीं आयी तो उनके सब्र का बाँध टूटने लगा।

“यही काम नहीं है मेरे पास, जल्दी करिए और भी चिट्ठियां पहुंचानी है”, और ऐसा कहकर काका दरवाज़ा पीटने लगे।

कुछ देर बाद दरवाज़ा खुला।

सामने का दृश्य देख कर काका चौंक गए।

एक 12-13 साल की लड़की थी जिसके दोनों पैर कटे हुए थे। उन्हें अपनी अधीरता पर शर्मिंदगी हो रही थी।

लड़की बोली, “क्षमा कीजियेगा मैंने आने में देर लगा दी, बताइए हस्ताक्षर कहाँ करने हैं?”

काका ने हस्ताक्षर कराये और वहां से चले गए।

इस घटना के आठ-दस दिन बाद काका को फिर उसी पते की चिट्ठी मिली। इस बार भी सब जगह चिट्ठियां पहुँचाने के बाद वे उस घर के सामने पहुंचे!

“चिट्ठी आई है, हस्ताक्षर की भी ज़रूरत नहीं है…नीचे से डाल दूँ।”, काका बोले।

“नहीं-नहीं, रुकिए मैं अभी आई।”, लड़की भीतर से चिल्लाई।

कुछ देर बाद दरवाजा खुला।

लड़की के हाथ में गिफ्ट पैकिंग किया हुआ एक डिब्बा था।

“काका लाइए मेरी चिट्ठी और लीजिये अपना तोहफ़ा।”, लड़की मुस्कुराते हुए बोली।

“इसकी क्या ज़रूरत है बेटा”, काका संकोचवश उपहार लेते हुए बोले।

लड़की बोली, “बस ऐसे ही काका…आप इसे ले जाइए और घर जा कर ही खोलियेगा!”

काका डिब्बा लेकर घर की और बढ़ चले, उन्हें समझ नहीं आर रहा था कि डिब्बे में क्या होगा!

घर पहुँचते ही उन्होंने डिब्बा खोला, और तोहफ़ा देखते ही उनकी आँखों से आंसू टपकने लगे।

डिब्बे में एक जोड़ी चप्पलें थीं। काका बरसों से नंगे पाँव ही चिट्ठियां बांटा करते थे लेकिन आज तक किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया था।

ये उनके जीवन का सबसे कीमती तोहफ़ा था…काका चप्पलें कलेजे से लगा कर रोने लगे; उनके मन में बार-बार एक ही विचार आ रहा था- बच्ची ने उन्हें चप्पलें तो दे दीं पर वे उसे पैर कहाँ से लाकर देंगे?

संवेदनशीलता एक बहुत बड़ा मानवीय गुण है। दूसरों के दुखों को महसूस करना और उसे कम करने का प्रयास करना एक महान काम है। जिस बच्ची के खुद के पैर न हों उसकी दूसरों के पैरों के प्रति संवेदनशीलता हमें एक बहुत बड़ा सन्देश देती है। आइये हम भी अपने समाज, अपने आस-पड़ोस, अपने यार-मित्रों-अजनबियों सभी के प्रति संवेदनशील बनें…आइये हम भी किसी के नंगे पाँव की चप्पलें बनें और दुःख से भरी इस दुनिया में कुछ खुशियाँ फैलाएं!

..................व्हाट्स एप्प से

मंगलवार, 26 सितंबर 2017

एक हिंदी लेखक....सेवा सदन प्रसाद

आज एक अलक....एक हिंदी लेखक

मोबाइल की घंटी बजी। ऑन करने पे आवाज आई -- "हेलो,  सुधीर जी नमस्कार ।"
" नमस्कार भाई साहब ।"
" सुधीर जी, आपकी कहानी बहुत अच्छी लगी
"कैसी कहानी  ? " सुधीर जी ने थोड़ा आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा ।
" अरे वही ' त्रासदी ' कहानी जो इस माह के मैगजीन में छपी है ।"

सुधीर जी को तो पता भी नहीं फिर भी अपने सम्मान की सुरक्षा हेतु बोल पड़े -- " हाँ, अभी देखी नहीं है ।"
" बस आपको मुबारकबाद देने के लिए फोन किया ।"
फोन कटते ही सुधीर जी दौड़ पड़े बुक स्टाल की ओर ।पत्रिका को उलट पुलट कर देखा। कहानी तो छपी थी पर जेब में इतने पैसे नहीं थे कि पत्रिका खरीद सके। बस वापस लौट पड़े ।
फिर लेखकीय प्रति के लिए पोस्ट आॅफिस का चक्कर। जब एक सप्ताह तक पत्रिका नहीं मिली तो संपादक महोदय को फोन किया ।संपादक महोदय ने बिंदास उत्तर दिया -- " हमारे यहां जिनकी भी रचना छपती है, हम प्रति भेज देते हैं ।शायद डाक में गुम हो गईं होगी ।आप लेखक हैं इसीलिए दूसरी प्रति आधे दाम में मिल जायेगी।
सुधीर जी बुत बन गये ।


- सेवा सदन प्रसाद
इस अलक ने लेखक की आज की परिस्थियों का सही आंकनल किया है


सोमवार, 25 सितंबर 2017

मिथक कथा जो आज प्रासंगिक है....पाँच आश्चर्य....

महाभारत के युद्ध की समाप्ति के पश्चात जब समय का चक्र सही गति से चलने लगा तब एक दिन श्री कृष्ण ने पाँचों पांडवों को आज्ञा दी –
“तुम पाँचों भाई वन में जाओ और जो कुछ भी दिखे वह आकर मुझे बताओ। मैं तुम्हें उसका प्रभाव बताऊँगा।”

पाँचों भाई वन में गये।
युधिष्ठिर महाराज ने देखा कि किसी हाथी की दो सूँड है। यह देखकर उनके आश्चर्य का पार न रहा।

अर्जुन दूसरी दिशा में गये। वहाँ उन्होंने देखा कि कोई पक्षी है, उसके पंखों पर वेद की ऋचाएँ लिखी हुई हैं पर वह पक्षी मुर्दे का मांस खा रहा है | यह भी किसी आश्चर्य से कम नहीं था !

भीम ने तीसरा आश्चर्य देखा कि गाय ने बछड़े को जन्म दिया है और बछड़े को इतना चाट रही है कि बछड़ा लहुलुहान हो जाता है।

सहदेव ने चौथा आश्चर्य देखा कि छः सात कुएँ हैं और आसपास के कुओं में पानी है किन्तु बीच का कुआँ खाली है। बीच का कुआँ गहरा है फिर भी पानी नहीं है।

पाँचवे भाई नकुल ने भी एक अदभुत आश्चर्य देखा कि एक पहाड़ के ऊपर से एक बड़ी शिला लुढ़कती-लुढ़कती आई और कितने ही वृक्षों से टकराई पर उन वृक्षों के तने उसे रोक न सके। कितनी ही अन्य शिलाओं के साथ टकराई पर वह रुक न सकीं। अंत में एक अत्यंत छोटे पौधे का स्पर्श होते ही वह स्थिर हो गई।

ये सभी अजूबे देखकर पाँचों भाईयों के आश्चर्यों का कोई पार नहीं रहा ! शाम को वे सभी श्रीकृष्ण के पास गये और अपने अलग-अलग दृश्यों का वर्णन किया।

युधिष्ठिर कहते हैं- “मैंने दो सूँडवाला हाथी देखा तो मेरे आश्चर्य का कोई पार न रहा।” तब श्री कृष्ण कहते हैं –  “कलियुग में ऐसे लोगों का राज्य होगा जो दोनों ओर से शोषण करेंगे । बोलेंगे कुछ और करेंगे कुछ। ऐसे लोगों का राज्य होगा। इसलिए तुम पहले राज्य कर लो।

अर्जुन ने आश्चर्य देखा कि पक्षी के पंखों पर वेद की ऋचाएँ लिखी हुई हैं और पक्षी मुर्दे का मांस खा रहा है। इस पर श्री कृष्णा बोले कि कलयुग में भी इसी तरह के लोग रहेंगे जो बड़े- बड़े पंडित और विद्वान कहलायेंगे किन्तु वे यही देखते रहेंगे कि कौन-सा मनुष्य मरे और हमारे नाम पर संपत्ति कर जाये। “संस्था” के व्यक्ति विचारेंगे कि कौन सा मनुष्य मरे और संस्था हमारे नाम से हो जाये। हर जाति धर्म के प्रमुख पद पर बैठे विचार करेंगे कि कब किसका श्राद्ध है ? चाहे कितने भी बड़े लोग होंगे किन्तु उनकी दृष्टि तो धन के ऊपर (मांस के ऊपर) ही रहेगी। परधन परमन हरन को वैश्या बड़ी चतुर। ऐसे लोगों की बहुतायत होगी, कोई कोई विरला ही संत पुरूष होगा।

भीम ने तीसरा आश्चर्य देखा कि गाय अपने बछड़े को इतना चाटती है कि बछड़ा लहुलुहान हो जाता है। इस आश्चर्य का वर्णन करते हुए कृष्णा बोले कि कलियुग का आदमी शिशुपाल हो जायेगा। बालकों के लिए इतनी ममता करेगा कि उन्हें अपने विकास का अवसर ही नहीं मिलेगा।
किसी का बेटा घर छोड़कर साधु बनेगा तो हजारों व्यक्ति दर्शन करेंगे….किन्तु यदि अपना बेटा साधु बनता होगा तो रोयेंगे कि मेरे बेटे का क्या होगा ? इतनी सारी ममता होगी कि उसे मोह-माया और परिवार में ही बाँधकर रखेंगे और उसका जीवन वहीं खत्म हो जाएगा। अंत में बेचारा अनाथ होकर मरेगा। वास्तव में लड़के तुम्हारे नहीं हैं, वे तो बहुओं की अमानत हैं; लड़कियाँ जमाइयों की अमानत हैं और तुम्हारा यह शरीर मृत्यु की अमानत है।तुम्हारी आत्मा तो परमात्मा की अमानत है। तुम अपने शाश्वत संबंध को जान लो बस, बेडा पार हो जायेगा !

सहदेव ने चौथा आश्चर्य यह देखा कि पाँच सात भरे कुएँ के बीच का कुआँ एक दम खाली ! सहदेव को समझाते हुए कृष्णा बोले कि कलियुग में धनाढय लोग लड़के-लड़की के विवाह में, मकान के उत्सव में, छोटे-बड़े उत्सवों में तो लाखों रूपये खर्च कर देंगे, परन्तु पड़ोस में ही यदि कोई भूखा प्यासा होगा तो यह नहीं देखेंगे कि उसका पेट भरा है या नहीं। दूसरी ओर मौज-मस्ती में, शराब, कबाब, फैशन और
व्यसन में पैसे उड़ा देंगे। किन्तु किसी के दो आँसूँ पोंछने में उनकी रूचि न होगी और जिनकी रूचि होगी उन पर कलियुग का प्रभाव नहीं होगा, उन पर भगवान का प्रभाव होगा।

अब आई नकुल की बारी जिन्होंने पाँचवा आश्चर्य ये देखा कि एक बड़ी चट्टान पहाड़ पर से लुढ़की, वृक्षों के तने और चट्टाने उसे रोक न
पाये किन्तु एक छोटे से पौधे से टकराते ही वह चट्टान रूक गई। इसी बात को समझाने हेतु कृष्णा कहते हैं कि कलियुग में मानव का मन नीचे गिरेगा, उसका जीवन पतित होगा । यह पतित जीवन धन की शिलाओं से नहीं रूकेगा न ही सत्ता के वृक्षों से रूकेगा । किन्तु हरिनाम के एक छोटे से पौधे से, हरि कीर्तन के एक छोटे से पौधे से मनुष्य के जीवन का पतन होना रूक जायेगा |

भले ही ये आश्चर्य पांडवों ने उस काल में देखे हो पर कलयुग में वही आश्चर्य अपनी सत्यता को प्रमाणित करते हैं |

शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

नुकसान...संजय रांका

कई बार लोग यंत्रवत उदारता दिखाते हैं 
और अचानक उनकी 
ओढ़ी हुई शालीनता से परदा उठ जाता है

वयोवृद्ध पिताजी उपचार से ठीक होकर घर आकर आज बेहद खुश थे. बार-बार उनके दिमाग में एक ही बात आ रही थी कि बचपल में मरणासन्न अवस्था में पहुच चुके बेटे को बचोने के लिए उन्होंने जी-जान एक कर दी थी, आज उसी बेटे ने करोड़ो के टर्न ओव्हर वाले बिजिनेस को छोड़कर लगातार आठ दिनों तक अस्पताल में रहकर उनकी सेवा की.

यह बात वे हर उस व्यक्ति को बड़े खुश होकर बता रहे थे जो उनका हालचाल जानने आ रहा था. हालचाल जानने का सिलसिला जब खत्म हुआ जो एक दिन पिता जी ने बेटे को बुलाकर खुशनुमा अंदाज में उसके हाथ में पचास हजार रुपए रख दिए.

बेटे ने पूछा पिता जी यह किसलिए?

पिताजी नें कहा बेटा मेरे इलाज का खर्च इतना तो हुआ ही होगा ?

उसके बाद बेटे ने जो कुछ कहा उसे सुनकर पिताजी को ऐसा लगा जैसे वे वैसी ही अवस्था मे पहुंच जैसी अवस्था किसी समय उनके बेटे की हो गई थी

बेटे ने कहा था..पिताजी मेरी दुकान आठ दिनों तक बन्द रही थी. उसका क्या?
-संजय रांका

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

तन्हाई............गीता तिवारी

जब कभी किसी
तन्हा सी शाम
बैठ अकेले चुपचाप 
पलटोगे जीवन पृष्ठों को
सच कहना तुम
क्या रोक सकोगे
इतिहास हुए उन पन्नों पर
मुझको नज़र आने से
क्या ये कह पाओगे
भुला दिया है मुझको तुमने
कैसे समझाओगे ख़ुद को
बहते अश्कों में छिपकर
याद मेरी जब आयेगी
शाम की उस तन्हाई में

-गीता तिवारी
अध्यापक 
पूर्व माध्यमिक विद्यालय 
गोरखपुर ,उ.प्र.

मंगलवार, 5 सितंबर 2017

सितम भी सहा कीजिए....डॉ. डी.एम. मिश्र


इस जहाँ का चलन भी निभा दीजिए
और अपने भी दिल का कहा कीजिए।

खोज में आप जिसकी परेशान हैं
पास में ही न हो ये पता कीजिए।

एक भी आप दुश्मन नहीं पायेगे
बस ,ज़रा और दिल को बड़ा कीजिए।

प्यार जैसा मज़ा पा लिया है अगर
मुस्कराकर सितम भी सहा कीजिए।
-डॉ. डी.एम. मिश्र

रविवार, 3 सितंबर 2017

डेटिंग.....अर्जित पांडेय

मैंने देखा उसे ,वो शीशे में खुद को निहार रहा था ,होठों पर लिपस्टिक धीरे धीरे लगाकर काफी खुश दिख रहा था मानो उसे कोई खजाना मिल गया हो । बेहया एक लड़का होकर लडकियों जैसी हरकतें!

हां,  इसके आलावा मैं और क्या सोच सकता था? आखिर मै ठहरा पुरुषप्रधान समाज का एक पुरुष ही न, जिसके सोचने की सीमा बड़ी संकरी है ।

उसके कमरे का दरवाजा खुला हुआ था बेहया के साथ ढीठ और बेशर्म भी ,जब लड़कियों जैसी हरकतें करनी ही थी तो बंद कमरे में करता। सबके सामने नुमाइश करने की क्या जरुरत है उसे?

‘दीप ये तुम क्या कर रहे हो?  मैंने उससे पूछा। मेरे शब्दों में प्रश्न भी था और क्रोध भी । प्रश्न इसलिए क्योंकि मै जानना चाहता था कि वो होंठो पर लाली क्यों लगा रहा है और क्रोध इसलिए कि एक पुरुष होकर सजना संवरना!

‘अरे अर्जित, तुम कब आये?  उसने खुश होकर पूछा।  ऐसी हरकत के बाद ख़ुशी!  ये तो बड़ा बेशर्म है मैंने मन ही मन सोचा । मैं उत्तर देने ही वाला था कि उसने एक और प्रश्न पूछ लिया,  ‘मैं कैसा दिख रहा हूँ अर्जित?

‘एक नंबर के नचनिया लग रहे हो । ऐसा लग रहा मानो पूरी दुनिया दर्शक बन बैठी है और तुम्हें उनके सामने नाचकर उनका दिल हिलाना है।’ मैंने झुंझलाकर उत्तर दिया,  ‘तुम स्त्रियों की भांति सज संवरकर कहा जा रहे हो हो?’

‘मैं डेट पर जा रहा हूं मित्र’ उसने थोड़ा शरमाकर कहा । उसका शरमाना मुझे जलाने के लिए काफी था।

‘यानि किसी पुरुष के साथ जा रहे हो डेट पर?’

‘हा हा हा, तुम पुरुष प्रधान समाज के लोग भी न? क्यों एक लड़का सज संवरकर किसी लड़की के साथ डेट पर चला जायेगा तो पाप हो जायेगा। ओह, तो मेरे प्यारे दोस्त को मेरा सजना संवरना अच्छा नहीं लगा।’ दीप ने मुझपर व्यंग्य कसा।

‘नहीं, मुझे मेरे दोस्त का लड़की बनना अच्छा नहीं लगा’ मैंने झट से उत्तर दिया।

‘क्यों? अगर मै होठों पर लाली लगा रहा ,सज सवर रहा तो क्या इससे मेरी मर्दानगी पर सवाल खड़ा हो जाता है? क्या मै मर्द नही दीखता?’

मै कुछ बोलने वाला ही था की दीप ने मुझे बीच में रोकर कहना शुरू किया, ‘आज जमाना कह रहा लड़के लडकियां बराबर है। अगर एक लड़की लडकों के रहन सहन को स्वीकार कर लेती है तो ज़माने को कोई दिक्कत नहीं पर अगर एक लड़का लड़की के रहन सहन को स्वीकारता है तो लोग उसे नचनिया ,बेशर्म ,बेहया कहना शुरू कर देते हैं। उसकी मर्दानगी पर सवाल खड़ा करते है। क्या एक पुरुष को सजने का अधिकार नहीं? क्या एक पुरुष को अच्छा दिखने का अधिकार नहीं? क्या होठों पर लिपस्टिक लगाने से मर्द ,मर्द नही रह जाता?

दीप के इन सवालों का जवाब मैं दे नहीं पाया। 
मैं आज भी इन सवालों के जवाब ढूँढ़ ही रहा हूँ

-अर्जित पांडेय
छात्र, एम. टेक,आईआईटी, 
दिल्ली
मोबाइल--7408918861

गुरुवार, 31 अगस्त 2017

बने भगवान बैठे हैं.....राहुल कुमार

यहाँ कुछ लोग तो खुद को, खुदा ही मान बैठे हैं 
कराते अपनी' ही पूजा बने भगवान बैठे हैं।

मगर है जुर्म औ दहशत, ही' कारोबार बस इनका 
के हिन्दुस्तान में कैसे, ये' तालेबान बैठे हैं।

जिन्हें तो खुद भुगतनी है, सजा अपने ही' कर्मों की 
न जाने और कितनों को दिये वरदान बैठे हैं।

हो' रहबर और रहजन की, भला पहचान कैसे अब 
ये मुजरिम ही समस्या का लिए संज्ञान बैठे है।

लगाकर राम का आता, मुखौटा अब तो' रावण भी 
न जाने औ छुपे कितने यहाँ शैतान बैठे हैं।

कोई किस्सा नहीं बस दर्ज ये तो इक हकीकत है 
ये सब "होरी" यहाँ दिल में लिए "गोदान" बैठे हैं।

- राहुल कुमार (नयानगर, समस्तीपुर) 
9776660562
रहजन= डाकू  ; रहबर =मार्गदर्शक

बुधवार, 30 अगस्त 2017

शब्द.....श्रीमती डॉ. प्रभा मुजुमदार


मेरे लिये शब्द एक औजार है.
भीतर की टूट-फूट
उधेडबुन अव्यवस्था और अस्वस्थता
की शल्यक्रिया के लिये।

शब्द एक आईना,
यदा-कदा अपने स्वत्व से 
साक्षात्कार के लिये।

मेरे लिये शब्द संगीत है.
ज़िन्दगी के सारे राग
और सुरों को समेटे हुए।

दोपहर की धूप में भोर की चहचहाट है तो 
रात की कालिख़ में नक्षत्रों की टिमटिमाहट।

मेरे लिये शब्द एक ढाल है,
चाही-अनचाही लड़ाइयों में
अपनी सुरक्षा के लिये।

मेरे लिये शब्द आँसू हैं,
यंत्रणा और विषाद की अभिव्यक्ति के लिये।
हताशा की भंवरों से लड़ने का सम्बल है।

शब्द एक रस्सी की तरह,
मन के अन्धे गहरे कुएं में 
दफ़न पड़ी यादों को खंगालने के लिये।

शब्द एक प्रतिध्वनि है,
वीरान/ अकेली/ निर्वासित नगरी में
हमसफ़र की तरह
साथ चलने के लिये।


-श्रीमती डॉ. प्रभा मुजुमदार


मंगलवार, 29 अगस्त 2017

माँ की व्यथा....आभा नौलखा


आज यह कड़ा निर्णय लेते हुए निकुंज की आँखों के सामने उसकी पूरी जिंदगी एक चलचित्र की भाँति घूम गई। उसे आज भी याद है वह शाम जब मम्मी-पापा ने उसे उसकी ज़िन्दगी से परिचित कराया था कि वह एक हिजड़ा है। पर यह सब बताने से पहले ही उसे इतना सशक्त बना दिया था कि यह बात उसे अपने लक्ष्य से हिला न सकी। उसने कड़ा निर्णय लिया कि वह अपने माता-पिता को उनकी इस मेहनत का फल अपनी मेहनत से देगी। और एक प्रतिष्ठित कंपनी में नौकरी पाकर सपना पूरा किया। वहीं तो उसकी मुलाक़ात अभय से हुई थी और कब प्यार हो गया पता ही न चला और निकुंज के बारे में सब पता चलने के बाद भी अभय का फ़ैसला न बदला। दोनों का विवाह हो गया, कुछ समय पश्चात उन्होंने निलेश को गोद ले लिया। कितना अच्छा जीवन बीत रहा था कि... निलेश बारह साल का ही तो था कि अभय का अकस्मात निधन हो गया, पर निकुंज ने हिम्मत न हारी...।
....अब वह समय आ गया है कि निलेश को सब कुछ बता दिया जाए, क्योंकि अब वह अट्ठारह बरस का हो गया है।
....पर, निलेश यह सुनते ही चिल्ला पड़ा!
....मतलब मैं अनाथ हूँ और तुम एक हिजड़ा...!
....एक हिजड़े के हाथों मेरा पालन-पोषण...छी...!
-आभा नौलखा