बुधवार, 19 जुलाई 2017

उधर चेहरा बदल लेते हैं लोग....अमृत

हवा के रुख के साथ ही, मसीहा बदल लेते हैं लोग।
इधर मौसम बदलते हैं, उधर चेहरा बदल लेते हैं लोग।।

बदल  बदल कर लोग, बदल रहे हैं ज़िन्दगी।
इधर टोपी बदलते  हैं, उधर  सेहरा  बदल लेते है लोग।।

कौन जाने कैसे पूरा करेंगे, वे अपना सफर।
इधर  किश्ती  बदलते हैं, उधर किनारा बदल लेते हैं।। 

रंग बदलना तो कोई गिरगिट, आदमजात से सीखे।
इधर चेहरा बदलते हैं, उधर मोहरा बदल लेते हैं लोग।।

हवा के रुख के  साथ ही, मसीहा बदल लेते हैं लोग।
इधर मौसम बदलते हैं, उधर चेहरा बदल लेते हैं लोग।।

-अमृत

रविवार, 16 जुलाई 2017

‘पगलिया’.......प्रशान्त पांडेय

एगो कुसुमिया है. हड़हड़ाते चलती है. मुंह खोली नहीं की राजधानी एक्सप्रेस फेल. हमरे यहां काम करने आती है. टेंथ का एक्जाम था तो काम छोड़ दी थी. दू-तीन महीना बाद अब जा के फिर पकड़ी है.

"तब सब ठीक है?" हम अइसही पूछ लिए. गलती किये। माने कुसुमिया का पटर-पटर चालू।

"सब ठीके न है....कमाना, खाना है..... चलिए रहा है......भाभी लेकिन धुक-धुक भी हो रहा है....परीक्षा में पास हो जाएंगे न?"

"काहे नहीं...मेहनत की हो, निकल जाओगी,"

"हाँ.....आ जरूरी भी न है, आज कल कोइयो तो पढ़ले-लिखल न खोजता है?"

तभी हमको याद आया की काम छोड़ने से पहले कुसुमिया बोली थी उसका सादी होने वाला है.

उस समय तो हम यही सोचे थे की आदिवासी लोग है, गरीब हईये है.......माई-बाप जल्दी सादी करके काम निपटा देना चाह रहा होगा। छौ  गो बच्चा में चार गो बेटिये है; आ ई सबसे बड़ी है.

अब हमरो मन कुलबुला रहा था.

पूछ लिए: "का हुआ तुम्हरा सादी का?"

"सादी? काहे ला सादी?"

"तुम्ही तो बोली थी छुट्टिया से पहले,"

"अरे! तो अभी घर में बोले नहीं हैं न....अइसे कइसे माँ से बोल दें.....अभी दू-तीन साल बाद देखेंगे,"

"दू-तीन साल बाद?"

"भाभी, सादी तो हम ही तय किये हैं....लेकिन लड़कवा का अभी कोई नौकरिये नहीं है.... एक्के बात है की खाता पीता नहीं है... ऊ भी पढ़ाइये न कर रहा है!"

"तुम्हरा माई-बाप? ऊ लोग भी तो खोज रहा होगा?"

"माँ को ढलैया के काम से फ़ुरसते नहीं है और बाप तो जानबे करते हैं.....ऊ कुछ करता तो हम लोग को काहे काम करना पड़ता?"

"अरे जो पूछ रहे हैं ऊ बता न.....सदिया करेगी की नहीं?”

"नहीं भाभी, अभिये ई सब पचड़ा में कौन पड़े...अभी कमा रहे हैं, खेला-मदारी चलिए रहा है........सादी कौन करेगा रे अभी? बक्क!"

जाने केतना और बकबकाने के बाद गयी तब हम, आ ई, खूब हँसे। ई हो घरे पर थे. उसका सब बात सुने थे.

"एतना साल सादी को हो गया, सोच सकते हैं की अपना चक्कर के बारे में कउनो लईकी अइसे बात करेगी?" हम इनसे पूछे. ई खाली हंस रहे थे.

उधर से अम्मा आईं. पूजा पर बइठे-बइठे उहो सब सुन लीं थीं. प्रसाद बाँटते हुए कहीं: "जाए दो! कम से कम इमनदारी से मान तो रही है. न तो इसी के लिए आज-काल केतना न करम हो जाता है."

-प्रशान्त पांडेय


शनिवार, 1 जुलाई 2017

थैंकू भैया....डॉ. आरती स्मित


वह माँ के साथ ज़बरन पाँव घसीटती चली जा रही थी। उसकी नज़रें बार-बार सड़क के दोनों ओर सजी दुकानों पर जा-जाकर अटक जातीं। मन हिलोर मारता कि माँ से कुछ कहे, मगर उसे डर था कि माँ से अभी कुछ कहने का मतलब यहीं बीच सड़क पर मार खाना होगा। यों भी, आज माँ का मूड कुछ ठीक नहीं, कल मालकिन ने ताकीद की थी, देर न करना, मगर देर हो ही गई, इसलिए काम में हाथ बँटाने को माँ उसको भी ज़बर्दस्ती साथ ले जा रही थी। अबीर~, गुलाल के रंग-बिरंगे पैकेट उसे बुलाते, तरह-तरह के रूपों वाली पिचकारियाँ, गुब्बारे सब उसे उसे इशारा करते से लगते। वह टूटी चप्पल घसीटती अधमरी सी चलती रही।
"अरी,चल ना! का हुआ, पाँव में छाले पड़ गए का.... एक तो ऐसे ही एतना देर हो चुका, जाने मालकिन का पारा केतना गरम होगा? परवी नै दी तो का फगुआ का बैसाखी। सारी भी तो दे के खातिर बोले रही, बिटवा का उतारन भी। चल न तुमको साथ काम करते देखेगी तो मन पसीजेगा जरूर, कुछ न कुछ दइए देगी।"
माँ बड़बड़ाती हाथ खींचती चलती रही।
"गली के मोड़ पर पहले पचमंज़िला मकान मालकिन का ही तो है। हे भगवान! उसका बेटा घर में न हो! केतना तंग करता है हमको।'' नौ वर्षीया निक्की ने मन ही मन ईश्वर को याद किया। कभी मंदिर गई नहीं, भगवान स्त्री हैं या पुरुष, उसको भ्रम बना हुआ है, मगर जब मुसीबत नज़र आती है,वह झट से भगवान को पुकार लेती। मालकिन बोली की कड़ी थी, मगर उसे कभी डाँटा नहीं, माँ को ज़रूर डाँटती कि इसे स्कूल भेजा कर! घर में बिठाकर अपने जैसा बनाएगी क्या?" उसे मालकिन से डर नहीं लगता मगर उसके बेटे ओम से लगता है, वह हमेशा छेड़ता रहता। उससे थोड़ा बड़ा है तो का? अकड़ू कहीं का!"
चप्पल उतार कर अभी बैठक में क़दम रखा ही था कि ओम दिख गया। वह सकपकाती हुई माँ के बगल जा खड़ी हुई।
"जा सीढ़ियों पर झाडू लगा दे, हम आते हैं कमरा में झाड़ू लगाकर।" वह हिली नहीं, सकपकाई सी खड़ी रही रही।
"अरी का हुआ, सुनाई कम देत है का?" माँ धीमी आवाज़ में मगर रोष में बोली।
"वो - वो- " वह हकला गई।
"चल जा, जल्दी काम कर,"कह कर माँ अंदर कमरे में चली गई। ओम चुपचाप कब उसके पीछे खड़ा हो गया, उसे पता ही न चला। अचानक उसे पाकर वह भीतर तक सिहर गई। ओम का हाथ पीछे था। "अब फिर यह मेरे बाल खींचेगा या चिकोटी काटेगा, हे भगवान का करें? आज तो चिल्ला कर रोने लगेंगे हम, मालकिन को पता चल जाएगा कि ...."
"निक्की," वह आगे सोच पाती, तभी ओम ने धीरे से उसे पुकारा और हाथ आगे बढ़ा दिया। उसके हाथ में रंग और अबीर पुड़िया की थैली और प्यारी-सी पिचकारी थी।
"यह तुम्हारे लिए।"
" नहीं-नहीं हमको नहीं चाहिए।" वह छिटककर दूर जा खड़ी हुई, तभी मालकिन कमरे में आ गई ।
"ले लो बेटा! भैया ने तुम्हारे लिए ख़रीदा है।" वह हैरान होकर कभी रंग और पिचकारी देखती, कभी ओम और मालकिन को। "तो क्या ओम उसे छोटी बहन समझ कर उसे तंग करता था, यही बात अच्छे से समझा भी सकता था, डरा कर रख दिया हमको" वह मन ही मन बुदबुदाई। साँवले चेहरे पर मुस्कान खिली और गुलाबी रंग निखर आया। होंठ हिले और बोल फूटे, "थैंकू भैया!"








-डॉ. आरती स्मित

रविवार, 11 जून 2017

मारकर भी खिलाता है...व्हाट्स एप्प से

जो सबके हृदय की धड़कनें चलाता है, 
भक्तवत्सल है वह 
अपने भक्त का वचन पूरा किये बिना शांत कैसे रहता


मलूकचंद नाम के एक सेठ थे। उनके घर के नजदीक ही एक मंदिर था। एक रात्रि को पुजारी जी के कीर्तन की ध्वनि के कारण उन्हें ठीक से नींद नहीं आयी। सुबह उन्होंने पुजारी जी को खूब डाँटा कि “यह सब क्या है ?”

पुजारी जी बोले “एकादशी का जागरण कीर्तन चल रहा था।”
“अरे ! क्या जागरण कीर्तन करते हो ? हमारी नींद हराम कर दी। अच्छी नींद के बाद ही व्यक्ति काम करने के लिए तैयार हो पाता है, फिर कमाता है तब खाता है।”

पुजारी जी ने कहा “मलूक जी ! खिलाता तो वह खिलाने वाला ही है।”
“क्या भगवान खिलाता है ! हम कमाते हैं तब खाते हैं।”

“निमित्त होता है तुम्हारा कमाना और पत्नी का रोटी बनाना, बाकी सबको खिलाने वाला, सबका पालनहार तो वह जगन्नियंता ही है।”

“क्या पालनहार-पालनहार लगा रखा है ! बाबा आदम के जमाने की बातें करते हो। क्या तुम्हारा पालने वाला एक-एक को आकर खिलाता है ?”
“सभी को वही खिलाता है।”

“हम नहीं खाते उसका दिया।”
“नहीं खाओ तो मारकर भी खिलाता है।”

“पुजारी जी ! अगर तुम्हारा भगवान मुझे चौबीस घंटों में खिला पाया तो फिर तुम्हें अपना यह भजन-कीर्तन सदा के लिए बंद करना होगा।”
“मैं जानता हूँ कि तुम्हारी बहुत पहुँच है लेकिन उसके हाथ बड़े लम्बे हैं। जब तक वह नहीं चाहता तब तक किसी का बाल भी बाँका नहीं हो सकता। आजमाकर देख लेना।” पुजारी जी भगवान में प्रीति वाले कोई सात्त्विक भक्त रहे होंगे।

मलूकचंद किसी घोर जंगल में चले गये और एक विशालकाय वृक्ष की ऊँची डाल पर चढ़कर बैठ गये कि .....
ʹअब देखें इधर कौन खिलाने आता है!ʹ
दो-तीन घंटे बाद एक अजनबी आदमी वहाँ आया। उसने उसी वृक्ष के नीचे आराम किया, फिर अपना सामान उठाकर चल दिया लेकिन एक थैला वहीं भूल गया। थोड़ी देर बार पाँच डकैत वहाँ से पसार हुए। उनमें से एक ने अपने सरदार से कहाः ” उस्ताद ! यहाँ कोई थैला पड़ा है।”
“क्या है जरा देखो।”

खोलकर देखा तो उसमें गरमागरम भोजन से भरा डिब्बा ! उन्होंने सोचा कि उन्हें पकड़ने या फँसाने के लिए किसी शत्रु ने ही जहर-वहर डालकर यह डिब्बा यहाँ रखा होगा अथवा पुलिस का कोई षडयंत्र होगा। उन्होंने इधर-उधर देखा लेकिन कोई भी आदमी नहीं दिखा। तब डाकुओं के मुखिया ने जोर से आवाज लगायीः “कोई हो तो बताये कि यह थैला यहाँ कौन छोड़ गया है ?”

मलूकचंद सोचने लगे कि ʹअगर मैं कुछ बोलूँगा तो ये मेरे ही गले पड़ेंगे।ʹ
वे तो चुप रहे लेकिन जो सबके हृदय की धड़कनें चलाता है, भक्तवत्सल है वह अपने भक्त का वचन पूरा किये बिना शांत कैसे रहता ! उसने उन डकैतों को प्रेरित किया कि ऊपर भी देखो। उन्होंने ऊपर देखा तो वृक्ष की डाल पर एक आदमी बैठा हुआ दिखा। डकैत चिल्लायेः “अरे ! नीचे उतर !”

“मैं नहीं उतरता।”
“क्यों नहीं उतरता, यह भोजन तूने ही रखा होगा।”
“मैंने नहीं रखा। कोई यात्री आया था, वही इसे भूलकर चला गया।”
“नीचे उतर ! तूने ही रखा होगा जहर-वहर मिलाकर और अब बचने के लिए बहाने बना रहा है। तुझे ही यह भोजन खाना पड़ेगा।” अब कौन सा काम वह सर्वेश्वर किसके द्वारा, किस निमित्त से करवाये या उसके लिए क्या रूप ले यह उसकी मर्जी की बात है। बड़ी गजब की व्यवस्था है उसकी !

मलूकचंद बोलेः “मैं नहीं उतरूँगा और खाना तो मैं कतई नहीं खाऊँगा।”
“पक्का तूने खाने में जहर मिलाया है। अब तो तुझे खाना ही होगा !”
“मैं नहीं खाऊँगा, नीचे भी नहीं उतरूँगा।”
“अरे, कैसे नहीं उतरेगा !”

डकैतों के सरदार ने हुक्म दियाः “इसको जबरदस्ती नीचे उतारो।”
मलूकचंद को पकड़कर नीचे उतारा गया। “ले खाना खा।”
“मैं नहीं खाऊँगा।”

उस्ताद ने धड़ाक से उनके मुँह पर तमाचा जड़ दिया। मलूकचंद को पुजारी जी की बात याद आयी कि ʹनहीं खाओगे तो मारकर भी खिलायेगा।ʹ
मलूकचंद बोलेः “मैं नहीं खाऊँगा।” वहीं डंडी पड़ी थी। डकैतों ने उससे उनकी नाक दबायी, मुँह खुलवाया और जबरदस्ती खिलाने लगे। वे नहीं खा रहे थे तो डकैत उन्हें पीटने लगे।

अब मलूकचंद ने सोचा कि ʹये पाँच हैं और मैं अकेला हूँ। नहीं खाऊँगा तो ये मेरी हड्डी पसली एक कर देंगे।ʹ इसलिए चुपचाप खाने लगे और मन-ही-मन कहाः ʹमान गये मेरे बाप ! मारकर भी खिलाता है ! डकैतों के रूप में आकर खिला चाहे भक्तों के रूप में लेकिन खिलाने वाला तो तू ही है। अपने पुजारी की बात तूने सत्य साबित कर दिखायी।ʹ वे सोचने लगे, ʹजिसने मुझे मारकर भी खिलाया, अब उस सर्वसमर्थ की ही मैं खोज करूँगा।ʹ


वे उस खिलाने वाले की खोज में घने जंगल में चले गये। वहाँ वे भगवदभजन में लग गये। लग गये तो ऐसे लगे कि मलूकचंद में से संत मलूकदास प्रकट हो गये।
.....व्हाट्स एप्प से

शनिवार, 10 जून 2017

यमराज मुझे स्वर्ग में ले गये...व्हाट्स एप्प से








कल रात मैंने एक
"सपना"  देखा.!
मेरी मृत्यु हो गई....

जीवन में कुछ अच्छे कर्म किये होंगे
इसलिये यमराज मुझे
स्वर्ग में ले गये...

देवदूतों ने
मुस्कुराकर
मेरा स्वागत किया...

मेरे हाथ में 
थैला देखकर पूछने लगे
''इसमें क्या है..?"
मैंने कहा...
''इसमें मेरे जीवन भर की कमाई है, 
पांच करोड़ रूपये हैं ।"

देवदूत ने 
बी आर पी-16011966'
नम्बर के लॉकर की ओर
इशारा करते हुए कहा-
''आपकी अमानत इसमें रख
दीजिये..!''

मैंने थैला वहाँ रख दिया...
मुझे एक कमरा भी दिया...

मैं नित्य-कर्म  से निपट कर
बाजार की तरफ निकला...
देवलोक के बाजार में
अद्भुत वस्तुएं देखकर
मेरा मन ललचा गया..!

मैंने कुछ चीजें पसन्द करके
टोकरी में डाली,
और काउंटर पर जाकर
उन्हें हजार हजार के
करारे नोटें देने लगा...

प्रबंधक ने 
नोटों को देखकर कहा,
''यह करेंसी यहाँ नहीं चलती..!''

यह सुनकर 
मैं हैरान रह गया..!

मैंने देवदूत के पास 
शिकायत की
देवदूत ने मुस्कुराते हुए कहा कि,
''आप व्यापारी होकर
इतना भी नहीं जानते..?
कि आपकी करेंसी
बाजू के मुल्क
पाकिस्तान,
श्रीलंका
और बांगलादेश में भी
नही चलती...

और आप
मृत्यूलोक की करेंसी
स्वर्गलोक में चलाने की
मूर्खता कर रहे हो..?''

यह सब सुनकर 
मुझे मानो साँप सूंघ गया..!

मैं जोर जोर से दहाड़े मारकर
रोने लगा.
और परमात्मा से
दरखास्त करने लगा, 
''हे भगवान्.ये...
क्या हो गया.?''
''मैंने कितनी मेहनत से
ये पैसा कमाया..!''
''दिन नही देखा, 
रात नही देखा,"
''पैसा कमाया...!''

''माँ बाप की सेवा नही की,
पैसा कमाया,
बच्चों की परवरीश नही की,
पैसा कमाया....
पत्नी की सेहत की ओर
ध्यान नही दिया, 
पैसा कमाया...!''

''रिश्तेदार, 
भाईबन्द, 
परिवार और
यार दोस्तों से भी 
किसी तरह की
हमदर्दी न रखते हुए
पैसा कमाया.!!"

''जीवन भर हाय पैसा
हाय पैसा किया...!
ना चैन से सोया, 
ना चैन से खाया...
बस,
जिंदगी भर पैसा कमाया.!''

''और यह सब 
व्यर्थ गया..?''

''हे ईश्वर अब क्या होगा"
अब क्या होगा..!''

देवदूत ने कहा,-
''रोने से 
कुछ हासिल होने वाला
नहीं है.!! "
"जिन जिन लोगो ने
यहाँ जितना भी पैसा लाया,
सब रद्दी हो गया।"

"जमशेद जी टाटा के
55 हजार करोड़ रूपये,
बिरला जी के
47 हजार करोड़ रूपये,
धीरू भाई अम्बानी के
29 हजार करोड़
अमेरिकन डॉलर...!
सबका पैसा यहां पड़ा है...!"

मैंने देवदूत से पूछा-
"फिर यहां पर 
कौनसी करेंसी
चलती है..?"

देवदूत ने कहा-
"धरती पर अगर 
कुछ अच्छे कर्म
किये है...!

जैसे किसी दुखियारे को
मदद की, 
किसी रोते हुए को
हंसाया, 
किसी गरीब बच्ची की
शादी कर दी, 
किसी अनाथ बच्चे को
पढ़ा लिखा कर 
काबिल बनाया...! 
किसी को 
व्यसनमुक्त किया...!
किसी अपंग स्कूल, वृद्धाश्रम या 
मंदिरों में दान धर्म किया...!"

"ऐसे पुण्य कर्म करने वालों को
यहाँ पर एक क्रेडिट कार्ड
मिलता है...!
और 
उसे वापर कर आप यहाँ
स्वर्गीय सुख का उपभोग ले
सकते है..!''

मैंने कहा,
"भगवन....
मुझे यह पता
नहीं था. 
इसलिए मैंने अपना जीवन 
व्यर्थ गँवा दिया.!!"

"हे प्रभु, 
मुझे थोडा आयुष्य दीजिये..!''
और मैं गिड़गिड़ाने लगा.!

देवदूत को मुझ पर दया आ गई.!!
उसने तथास्तु कहा 
और मेरी नींद खुल गयी..!
मैं जाग गया..!
अब मैं वो दौलत कमाऊँगा
जो वहाँ चलेगी..!!
-व्हाट्स एप्प से

शुक्रवार, 9 जून 2017

“जब तक हो सके, आत्मनिर्भर रहो।”...व्हाट्स एप्प से


कल दिल्ली से गोवा  की उड़ान में एक सरदारजी मिले। साथ में उनकी पत्नि भी थीं।
सरदारजी की उम्र करीब 80 साल रही होगी। मैंने पूछा नहीं लेकिन सरदारनी भी 75 पार ही रही होंगी।
उम्र के सहज प्रभाव को छोड़ दें, तो दोनों करीब करीब फिट थे।
सरदारनी खिड़की की ओर बैठी थीं, सरदारजी बीच में और मैं सबसे किनारे वाली सीट पर था।
उड़ान भरने के साथ ही सरदारनी ने कुछ खाने का सामान निकाला और सरदारजी की ओर किया। सरदार जी कांपते हाथों से धीरे-धीरे खाने लगे।
फिर फ्लाइट में जब भोजन सर्व होना शुरू हुआ तो उन लोगों ने राजमा-चावल का ऑर्डर किया।

दोनों बहुत आराम से राजमा-चावल खाते रहे। मैंने पता नहीं क्यों पास्ता ऑर्डर कर दिया था। खैर, मेरे साथ अक्सर ऐसा होता है कि मैं जो ऑर्डर करता हूं, मुझे लगता है कि सामने वाले ने मुझसे बेहतर ऑर्डर किया है।

अब बारी थी कोल्ड ड्रिंक की।
पीने में मैंने कोक का ऑर्डर दिया था।
अपने कैन के ढक्कन को मैंने खोला और धीरे-धीरे पीने लगा।

सरदार जी ने कोई जूस लिया था।

खाना खाने के बाद जब उन्होंने जूस की बोतल के ढक्कन को खोलना शुरू किया तो ढक्कन खुले ही नहीं।

सरदारजी कांपते हाथों से उसे खोलने की कोशिश कर रहे थे। 
मैं लगातार उनकी ओर देख रहा था। मुझे लगा कि ढक्कन खोलने में उन्हें मुश्किल आ रही है तो मैंने शिष्टाचार हेतु कहा कि लाइए... " मैं खोल देता हूं।"

सरदारजी ने मेरी ओर देखा, फिर मुस्कुराते हुए कहने लगे कि...  "बेटा ढक्कन तो मुझे ही खोलना होगा।

मैंने कुछ पूछा नहीं, लेकिन सवाल भरी निगाहों से उनकी ओर देखा।

यह देख,  सरदारजी ने आगे कहा बेटाजी, आज तो आप खोल देंगे। लेकिन अगली बार..? कौन खोलेगा.?

 इसलिए मुझे खुद खोलना आना चाहिए। सरदारनी भी सरदारजी की ओर देख रही थीं।

जूस की बोतल का ढक्कन उनसे अभी भी नहीं खुला था। पर सरदारजी लगे रहे और बहुत बार कोशिश कर के उन्होंने ढक्कन खोल ही दिया।

दोनों आराम से जूस पी रहे थे।

मुझे दिल्ली से गोवा की इस उड़ान में ज़िंदगी का एक सबक मिला।

सरदारजी ने मुझे बताया कि उन्होंने.. ये नियम बना रखा है,
कि अपना हर काम वो खुद करेंगे। घर में बच्चे हैं, भरा पूरा परिवार है।
सब साथ ही रहते हैं। पर अपनी रोज़ की ज़रूरत के लिये वे  सिर्फ सरदारनी की मदद ही लेते हैं, बाकी किसी की नहीं।
वो दोनों एक दूसरे की ज़रूरतों को समझते हैं
सरदारजी ने मुझसे कहा कि जितना संभव हो, अपना काम खुद करना चाहिए।
एक बार अगर काम करना छोड़ दूंगा, दूसरों पर निर्भर हुआ तो समझो बेटा कि बिस्तर पर ही पड़ जाऊंगा।
फिर मन हमेशा यही कहेगा कि ये काम इससे करा लूं, वो काम उससे।
फिर तो चलने के लिए भी दूसरों का सहारा लेना पड़ेगा।
अभी चलने में पांव कांपते हैं, खाने में भी हाथ कांपते हैं, पर जब तक आत्मनिर्भर रह सको, रहना चाहिए।
हम गोवा जा रहे हैं, दो दिन वहीं रहेंगे।

हम महीने में एक दो बार ऐसे ही घूमने निकल जाते हैं।

बेटे-बहू कहते हैं कि अकेले मुश्किल होगी, पर उन्हें कौन समझाए कि मुश्किल तो तब होगी जब हम घूमना-फिरना बंद करके खुद को घर में कैद कर लेंगे।

पूरी ज़िंदगी खूब काम किया। अब सब बेटों को दे कर अपने लिए महीने के पैसे तय कर रखे हैं। और हम दोनों उसी में आराम से घूमते हैं।
जहां जाना होता है एजेंट टिकट बुक करा देते हैं। घर पर टैक्सी आ जाती है। वापिसी में एयरपोर्ट पर भी टैक्सी ही आ जाती है।
होटल में कोई तकलीफ होनी नहीं है। स्वास्थ्य, उम्रनुसार, एकदम ठीक है। कभी-कभी जूस की बोतल ही नहीं खुलती। पर थोड़ा दम लगाओ, तो वो भी खुल ही जाती है।
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मेरी तो आखेँ ही खुली की खुली रह गई।
मैंने तय किया था कि इस बार की उड़ान में लैपटॉप पर एक पूरी फिल्म देख लूंगा।पर यहां तो मैंने जीवन की फिल्म ही देख ली। एक वो  फिल्म जिसमें जीवन जीने का संदेश छिपा था।
“जब तक हो सके,
 आत्मनिर्भर रहो।”
अपना काम,
 जहाँ तक संभव हो,
स्वयम् ही करो।
......व्हाट्स एप्प से

गुरुवार, 8 जून 2017

बेटी तो बाप के लिए रहमत होती है......व्हाट्स एप्प से


लड़कियों के स्कूल में आने वाली नई टीचर ख़ूबसूरत और बा अख़्लाक़ होने के साथ साथ इल्मी तौर पर भी मज़बूत थी लेकिन उसने अभी तक शादी नहीं की थी..

 सब लड़कियां उसके इर्द-गिर्द जमा हो गईं और मज़ाक़ करने लगीं कि मैडम आपने अभी तक शादी क्यों नहीं की..?

मैडम ने दास्तान कुछ यूं शुरू की_एक ख़ातून की पांच बेटियां थीं, शौहर ने उसको धमकी दी कि अगर इस दफा भी बेटी हुई तो उस बेटी को बाहर किसी सड़क या चौक पर फेंक आऊंगा,

ख़ुदा की हिकमत ख़ुदा ही जाने कि छटी मर्तबा भी बेटी पैदा हुई और मर्द ने बेटी को उठाया और रात के अंधेरे में शहर के बीचों-बीच चौक पर रख आया, मां पूरी रात उस नन्ही सी जान के लिए दुआ करती रही और बेटी को अल्लाह के सुपुर्द कर दिया।

दूसरे दिन सुबह बाप जब चौक से गुज़रा तो देखा कि कोई बच्ची को ले नहीं गया बाप बेटी को वापस घर लाया लेकिन दूसरी रात फिर बेटी को चौक पर रख आया लेकिन माजरा उसी तरह तकरार होता रहा यहां तक कि सात दिन बाप बाहर रख आया और जब कोई लेना जाता तो मजबूरन वापस उठा लाता,

यहां तक कि बाप थक गया और ख़ुदा की रज़ा पर राज़ी हो गया और फिर ख़ुदा काम करना ऐसा हुआ कि एक साल बाद मां फिर हामिला हो गई और इस दफा अल्लाह ने उनको बेटा अता फरमा दिया लेकिन कुछ ही दिन बाद बेटियों में से एक फौत हो गई यहां तक कि पांच बार हामिला हुई और अल्लाह ने पांच बेटे अता किए लेकिन हर दफा उसकी बेटियों में से एक इस दुनियां से रुख्सत हो जाती 

फ़क़त एक ही बेटी ज़िंदा बची और वो वही बेटी थी जिससे बाप जान छुड़ाना चाह रहा था, मां भी इस दुनियां से चली गई इधर पांच बेटे और एक बेटी सब बड़े हो गए टीचर ने कहा पता है वो बेटी जो ज़िंदा रही कौन है.? "वो मैं हूं" और मैंने अभी तक शादी इसलिए नहीं की कि बाप इतने बूढ़े हो गए हैं कि अपने हाथ से खाना भी नहीं खा सकते जबकि कोई दूसरा नहीं जो उनकी खिदमत करें बस मैं ही उनकी खिदमत किया करती हूं और वो पांच बेटे कभी कभी आकर बाप की अहवाल पुरसी कर जाते हैं 

जबकि बाप हमेशा शर्मिंदगी के साथ रो रो कर मुझ से कहा करते हैं, मेरी प्यारी बेटी जो कुछ मैंने बचपन में तेरे साथ किया उस पर मुझे मुआफ करना, मैंने किसी जगह बेटी की बाप से मुहब्बत के बारे मैं एक प्यारी बात पढ़ी थी कि एक बाप बेटे के साथ फुटबॉल खेल रहा था और बेटे की हौसला अफजाई के लिए जान बूझ कर हार रहा था दूर बैठी बेटी बाप की शिकस्त बर्दाश्त ना कर सकी और बाप के साथ लिपट के रोने लगी और बोली बाबाजान आप मेरे साथ खेलें, ताकि मैं आपकी जीत के लिए खुद जान बूझ कर हार जाऊं 

और सच कहा जाता है कि
बेटी तो बाप के लिए रहमत होती है..
.....व्हाट्स  एप्प से

शुक्रवार, 12 मई 2017

न देने वाला मन....लघुकथा



एक भिखारी सुबह-सुबह भीख मांगने निकला। चलते समय उसने अपनी झोली में जौ के मुट्ठी भर दाने डाल लिए। टोटके या अंधविश्वास के कारण भिक्षाटन के लिए निकलते समय भिखारी अपनी झोली खाली नहीं रखते। थैली देख कर दूसरों को लगता है कि इसे पहले से किसी ने दे रखा है। पूर्णिमा का दिन था, भिखारी सोच रहा था कि आज ईश्वर की कृपा होगी तो मेरी यह झोली शाम से पहले ही भर जाएगी।

अचानक सामने से राजपथ पर उसी देश के राजा की सवारी आती दिखाई दी। भिखारी खुश हो गया। उसने सोचा, राजा के दर्शन और उनसे मिलने वाले दान से सारे दरिद्र दूर हो जाएंगे, जीवन संवर जाएगा। जैसे-जैसे राजा की सवारी निकट आती गई, भिखारी की कल्पना और उत्तेजना भी बढ़ती गई। जैसे ही राजा का रथ भिखारी के निकट आया, राजा ने अपना रथ रुकवाया, उतर कर उसके निकट पहुंचे। भिखारी की तो मानो सांसें ही रुकने लगीं। लेकिन राजा ने उसे कुछ देने के बदले उलटे अपनी बहुमूल्य चादर उसके सामने फैला दी और भीख की याचना करने लगे। भिखारी को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे। अभी वह सोच ही रहा था कि राजा ने पुन: याचना की। भिखारी ने अपनी झोली में हाथ डाला, मगर हमेशा दूसरों से लेने वाला मन देने को राजी नहीं हो रहा था। जैसे-तैसे कर उसने दो दाने जौ के निकाले और उन्हें राजा की चादर पर डाल दिया। उस दिन भिखारी को रोज से अधिक भीख मिली, मगर वे दो दाने देने का मलाल उसे सारे दिन रहा। शाम को जब उसने झोली पलटी तो उसके आश्चर्य की सीमा न रही। जो जौ वह ले गया था, उसके दो दाने सोने के हो गए थे। उसे समझ में आया कि यह दान की ही महिमा के कारण हुआ है। 
वह पछताया कि काश! उस समय राजा को और अधिक जौ दी होती, लेकिन नहीं दे सका, क्योंकि देने की आदत जो नहीं थी।

गुरुवार, 11 मई 2017

दुख का कारण....लघु कथा



एक व्यापारी को नींद न आने की बीमारी थी। उसका नौकर मालिक की बीमारी से दुखी रहता था। एक दिन व्यापारी अपने नौकर को सारी संपत्ति देकर चल बसा। 
सम्पत्ति का मालिक बनने के बाद नौकर रात को सोने की कोशिश कर रहा था, किन्तु अब उसे नींद नहीं आ रही थी। एक रात जब वह सोने की कोशिश कर रहा था, उसने कुछ आहट सुनी। 
देखा, एक चोर घर का सारा सामान समेट कर उसे बांधने की कोशिश कर रहा था, परन्तु चादर छोटी होने के कारण गठरी बंध नहीं रही थी।

नौकर ने अपनी ओढ़ी हुई चादर चोर को दे दी और बोला, 
इसमें बांध लो। उसे जगा देखकर चोर सामान छोड़कर भागने लगा। किन्तु नौकर ने उसे रोककर हाथ जोड़कर कहा, 
भागो मत, इस सामान को ले जाओ ताकि मैं चैन से सो सकूँ। 
इसी ने मेरे मालिक की नींद उड़ा रखी थी और अब मेरी। 
उसकी बातें सुन चोर की भी आंखें खुल गईं।

बुधवार, 10 मई 2017

प्रेम और भक्ति में हिसाब!


एक पहुंचे हुए सन्यासी का एक शिष्य था, जब भी किसी मंत्र का जाप करने बैठता तो संख्या को खडिया से दीवार पर लिखता जाता। किसी दिन वह लाख तक की संख्या छू लेता किसी दिन हजारों में सीमित हो जाता। उसके गुरु उसका यह कर्म नित्य देखते और मुस्कुरा देते।

एक दिन वे उसे पास के शहर में भिक्षा मांगने ले गये। जब वे थक गये तो लौटते में एक बरगद की छांह बैठे, उसके सामने एक युवा दूधवाली दूध बेच रही थी, जो आता उसे बर्तन में नाप कर देती और गिनकर पैसे रखवाती। वे दोनों ध्यान से उसे देख रहे थे। तभी एक आकर्षक युवक आया और दूधवाली के सामने अपना बर्तन फैला दिया, दूधवाली मुस्कुराई और बिना मापे बहुत सारा दूध उस युवक के बर्तन में डाल दिया, पैसे भी नहीं लिये। गुरु मुस्कुरा दिये, शिष्य हतप्रभ!

उन दोनों के जाने के बाद, वे दोनों भी उठे और अपनी राह चल पडे। चलते चलते शिष्य ने दूधवाली के व्यवहार पर अपनी जिज्ञासा प्रकट की तो गुरु ने उत्तर दिया,

'' प्रेम वत्स, प्रेम! यह प्रेम है, और प्रेम में हिसाब कैसा? उसी प्रकार भक्ति भी प्रेम है, जिससे आप अनन्य प्रेम करते हो, उसके स्मरण में या उसकी पूजा में हिसाब किताब कैसा?'' और गुरु वैसे ही मुस्कुराये व्यंग्य से।

'' समझ गया गुरुवर। मैं समझ गया प्रेम और भक्ति के इस दर्शनप्रेम और भक्ति में हिसाब!

मंगलवार, 9 मई 2017

गधे की कब्र


एक फकीर किसी बंजारे की सेवा से बहुत प्रसन्न हो गया। और उस बंजारे को उसने एक गधा भेंट किया। बंजारा बड़ा प्रसन्न था। गधे के साथ, अब उसे पेदल यात्रा न करनी पड़ती थी। सामान भी अपने कंधे पर न ढोना पड़ता था। और गधा बड़ा स्वामीभक्त था।

लेकिन एक यात्रा पर गधा अचानक बीमार पडा और मर गया। दुःख में उसने उसकी कब्र बनायी, और कब्र के पास बैठकर रो रहा था कि एक राहगीर गुजरा।

उस राहगीर ने सोचा कि जरूर किसी महान आत्मा की मृत्यु हो गयी है। तो वह भी झुका कब्र के पास। इसके पहले कि बंजारा कुछ कहे, उसने कुछ रूपये कब्र पर चढ़ाये। बंजारे को हंसी भी आई आयी। लेकिन तब तक भले आदमी की श्रद्धा को तोड़ना भी ठीक मालुम न पडा। और उसे यह भी समझ में आ गया कि यह बड़ा उपयोगी व्यवसाय है।

फिर उसी कब्र के पास बैठकर रोता, यही उसका धंधा हो गया। लोग आते, गांव-गांव खबर फैल गयी कि किसी महान आत्मा की मृत्यु हो गयी। और गधे की कब्र किसी पहुंचे हुए फकीर की समाधि बन गयी। ऐसे वर्ष बीते, वह बंजारा बहुत धनी हो गया। 
फिर एक दिन जिस सूफी साधु ने उसे यह गधा भेंट किया था। वह भी यात्रा पर था और उस गांव के करीब से गुजरा। उसे भी लोगों ने कहा, ऐ महान आत्मा की कब्र है यहां, दर्शन किये बिना मत चले जाना। वह गया देखा उसने इस बंजारे को बैठा, तो उसने कहा, किसकी कब्र है यहा, और तू यहां बैठा क्यों रो रहा है। उस बंजारे ने कहां, अब आप से क्या छिपाना, जो गधा आप ने दिया था। उसी की कब्र है। जीते जी भी उसने बड़ा साथ दिया और मर कर और ज्यादा साथ दे रहा है। सुनते ही फकीर खिल खिलाकर हंसने लगा। उस बंजारे ने पूछा आप हंसे क्यों? फकीर ने कहां तुम्हें पता है। जिस गांव में मैं रहता हूं वहां भी एक पहुंचे हुए महात्मा की कब्र है। उसी से तो मेरा काम चलता है। बंजारे ने पूछा वह किस महात्मा की कब्र है। तुम्हें मालूम है। उसने कहां मुझे कैसे नहीं, पर क्या आप को मालूम है। क्यों नहीं मालूम हो सकता, वह इसी गधे की मां की कब्र है।

धर्म के नाम पर अंधविश्वासों का बड़ा विस्तार है। धर्म के नाम पर थोथे, व्यर्थ के क्रियाकांड़ो, यज्ञों, हवनों का बड़ा विस्तार है। फिर जो चल पड़ी बात, उसे हटाना मुश्किल हो जाता है। जो बात लोगों के मन में बैठ गयी। उसे मिटाना मुश्किल हो जाता है। और इसे बिना मिटाये वास्तविक धर्म का जन्म नहीं हो सकता। अंधविश्वास उसे जलने ही न देगा।

सभी बुद्धिमान व्यक्तियों के सामने यही सवाल थे। और दो ही विकल्प है। एक विकल्प है नास्तिकता का, जो अंधविश्वास को इन कार कर देता है। और अंधविश्वास के साथ-साथ धर्म को भी इंकार कर देता है। क्योंकि नास्तिकता देखती है इस धर्म के ही कारण तो अंधविश्वास खड़े होते है। तो वह कूड़े-कर्कट को तो फेंक ही देती है। साथ में उस सोने को भी फेंक देती है। क्योंकि इसी सोने की बजह से तो कूड़ा कर्कट इक्कठ होता हे। न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी।

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

किसी के इतने पास न जा......अनुपम वर्मा



कमरे में चारों तरफ़ अँधेरा और सन्नाटा ही था,ठीक वैसा ही सन्नाटा उस कमरे में मौजूद हस्ती के वजूद पर भारी था.......
उनकी चीखें और दहाड़ मार कर मातम करने की ख्वाहिश भी जैसे उस रात उनके घर के पिछवाडे में कब्र खोद कर दफन कर दी गई हो
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अब्बू हमें जल्द ही ये शहर छोड़ना होगा-,उमेर ने चाय का घूंट हलक में उतारते हुए कहा मगर फिरोज साहब ने जैसे अनसुना कर दिया !वो अब भी छत पर लटकते फानूस को गायब दिमागी से देखे जा रहे थे!पिछली ईद पर ही तो उनकी हानिया ने मंगवाया था........ 
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जुबैर,मैं कितने दिन छिपा सकती हूँ अम्मी अब्बू से हमारे बारे में ? आप प्लीज़ अपने घरवालों को मेरे घर भेजें !!
भाई सख्त खफा हैं मेरे रवैये से क्योंकि मैं ही बिना किसी माक़ूल वज़ह के शादी से इनकार कर रही हूँ.......कुछ परेशान सी, घनी पलकों वाली हानिया उस वक़्त जुबैर को अपने दिल के और करीब महसूस हुई!!!!
" हानी, मैं इसी सण्डे को अम्मी अब्बू को भेजता हूँ, अब्बू वापस आ रहे हैं इसी हफ्ते..... जुबैर ने यकीन दिलाया उसे !! और फ़िर दोनों खामोश होकर कॉलेज के ग्राउंड की घास को बेवजह तोड़ते रहे !!!!
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सेटर्डे की शाम से ही जुबैर का फोन ऑफ था, जुबैर के दोस्त ज्यादा नहीं थे जितने भी थे उनसे हानी और जुबैर के रिश्ते की संजीदगी छिपी हुई थी इसलिये सख्त परेशान होते हुए भी हानिया दिल ही दिल में सिर्फ़ दुआ ही कर पाई !!!!!!
इसी आलम में उमेर भाई कमरे के अंदर आये और अपने लहजे के खिलाफ़ मिठास घोल कर बोले.........."चल हानी तुझे आज आइसक्रीम खिला कर लाता हूँ""
कोई और वक़्त होता तो हानिया खुशी से झूम उठती इस पेशकश पर मगर अभी उसका जहन जुबैर में उलझा था इसलिये बमुश्किल ही सही इनकार कर दिया !!! मगर उमैर ने एक ना सुनी, आइस क्रीम खिलाने के बाद हानिया को दो रेडीमेड खूबसूरत सूट दिलाये और फ़िर डिनर पर भी ले गया!!
हानिया खुश थी और भाई के होने को महसूस कर रही थी
वह बिरयानी की खुशबू से ज्यादा भाई का प्यार महसूस कर रही थी !इतने में ही मैसेज टोन बजा.......भाई के सामने उसने देखना ठीक नहीं समझा,यूँ ही उसे भाई का साथ मुश्किल से मिला था !!!
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वापसी में हानिया जहनी तौर पर हल्का महसूस कर रही थी!! पोर्च में गाड़ी रुकते ही उसे अब्बू दिख गए जो शायद क्यारी की तरफ़ से आये थे..मिट्टी लगी थी सारे कपडों पर!! अम्मी भी मिजाज के खिलाफ आज पौधों को पानी दे रही थीं वो भी इस वक़्त !!! हानिया खुश थी इस तब्दीली से !!!
कमरे में जाकर उसने मोबाइल उठाया ही था कि अम्मी दूध का गिलास लेकर आ गयीं, "हानी, मेरी बच्ची आज मैं तेरे साथ ही सोउँगी, ले तू दूध ख़त्म कर!!!
अम्मी मैं नहीं पी सकती, आज भाई ने बेवजह ही दावत दे डाली.....हानिया ने इनकार करने की पुरजोर कोशिश की मगर अम्मी का दिल दुखने के डर से एक साँस में ही पी गई !!! दूध उसे हमेशा से नापसंद था और आज कुछ ज़्यादा ही अजीब लग रहा था!!!!!

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अम्मी ने उसका सर गोद में रख लिया और अपनी अंगुलियों से उसके रेशम जैसे बाल सहलाती रहीं!!! अम्मी के सामने जुबैर को कॉल नही कर सकती थी इसीलिये मैसेज करने के लिए फोन अनलॉक किया कि जुबैर का मैसेज जगमगाया.......अम्मी ना होतीं तो शायद खुशी से चीख पड़ती मगर........
अम्मी के सामने भी चीखी ही थी ---बेयकीनी से , ग़म की शिद्दत से , माँ बाप और भाई की बेरहमी से ,एक बेकसूर के कत्ल की वजह बनने के अहसास से.......आखिरी पैगाम था जुबैर की तरफ़ से...........हानी, मुझे धोखेबाज़ मत समझना!! हमें उस दिन उमैर भाई ने एक साथ देख लिया था! उन्होंने मुझसे मुलाकात की ,पसंद भी किया !! मगर वादा ले लिया कि तुम्हे ना बताऊँ !! मुझे वादे का पास रखना था! उन्होंने मुझे कोल्ड ड्रिंक में ज़हर दे दिया ! मर रहा हूँ ! शायद तुम्हारे घर में ही गाड़ दिया जाऊँ! मेरे अम्मी अब्बू की ख़बर लेते रहना! साँसें चल रहीं हैं! शायद जिंदा ही दफन किया जाऊँगा.................
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अम्मी ने हानी का मोबाइल लेकर मैसेज डिलीट कर दिया !!!!
हानी के मुँह से झाग निकल रहा था!!
इस वक़्त वो जिंदा लाश बनकर एक लाश को घूर रहीं थीं
कुछ वक़्त बाद इस लाश को भी दूसरी लाश के बगल में दफना कर वहाँ चम्पा के सफ़ेद फूलों वाले पौधे रोप दिये जायेंगे !!!
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आज वो पौधे बडे हो चुके हैं !!!खुशबू है उन चम्पा के फूलों में
मगर जुबैर और हानिया की मोहब्बत की खुशबू !!
अकसर कुंदुस बेगम के आँसुओं के क़तरे ओस के कतरों के साथ इन पौधों की सब्ज पत्तियों पर जम जाते हैं
अकसर वह इन मासूमों की अनाम कब्रों पर अपने गुनाह की सज़ा के लिये दुआ माँगती हैं
-अनुपम वर्मा
अगस्त 29, 2016




बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

भाग्य और पुरुषार्थ... प्रेरक कथा


एक बार दो राज्यों के बीच युद्ध की तैयारियां चल रही थीं। दोनों के शासक एक प्रसिद्ध संत के भक्त थे। वे अपनी-अपनी विजय का आशीर्वाद मांगने के लिए अलग-अलग समय पर उनके पास पहुंचे। पहले शासक को आशीर्वाद देते हुए संत बोले, ‘तुम्हारी विजय निश्चित है।’

दूसरे शासक को उन्होंने कहा, ‘तुम्हारी विजय संदिग्ध है।’ दूसरा शासक संत की यह बात सुनकर चला आया किंतु उसने हार नहीं मानी और अपने सेनापति से कहा, ‘हमें मेहनत और पुरुषार्थ पर विश्वास करना चाहिए। इसलिए हमें जोर-शोर से तैयारी करनी होगी। दिन-रात एक कर युद्ध की बारीकियां सीखनी होंगी। अपनी जान तक को झोंकने के लिए तैयार रहना होगा।’

इधर पहले शासक की प्रसन्नता का ठिकाना न था। उसने अपनी विजय निश्चित जान अपना सारा ध्यान आमोद-प्रमोद व नृत्य-संगीत में लगा दिया। उसके सैनिक भी रंगरेलियां मनाने में लग गए। निश्चित दिन युद्ध आरंभ हो गया। जिस शासक को विजय का आशीर्वाद था, उसे कोई चिंता ही न थी। उसके सैनिकों ने भी युद्ध का अभ्यास नहीं किया था। दूसरी ओर जिस शासक की विजय संदिग्ध बताई गई थी, उसने व उसके सैनिकों ने दिन-रात एक कर युद्ध की अनेक बारीकियां जान ली थीं। उन्होंने युद्ध में इन्हीं बारीकियों का प्रयोग किया और कुछ ही देर बाद पहले शासक की सेना को परास्त कर दिया।

अपनी हार पर पहला शासक बौखला गया और संत के पास जाकर बोला, ‘महाराज, आपकी वाणी में कोई दम नहीं है। आप गलत भविष्यवाणी करते हैं।’ उसकी बात सुनकर संत मुस्कराते हुए बोले, ‘पुत्र, इतना बौखलाने की आवश्यकता नहीं है। तुम्हारी विजय निश्चित थी किंतु उसके लिए मेहनत और पुरुषार्थ भी तो जरूरी था। भाग्य भी हमेशा कर्मरत और पुरुषार्थी मनुष्यों का साथ देता है और उसने दिया भी है तभी तो वह शासक जीत गया जिसकी पराजय निश्चित थी।’ संत की बात सुनकर पराजित शासक लज्जित हो गया और संत से क्षमा मांगकर वापस चला आया।

मंगलवार, 31 जनवरी 2017

चार मित्र .......




बहुत समय पहले की बात है। एक छोटा सा नगर था जहां चार बहुत ही घनिष्ठ मित्र रहते थे। उनमें एक था राजकुमार, दूसरा मंत्री का पुत्र, तीसरा सहूकार का लड़का और चौथा एक किसान का बेटा। चारों साथ साथ खाते पीते और खेलते घूमते थे।
एक दिन किसान ने अपने पुत्र से कहा "देखो बेटा तुम्हारे तीनों साथी धनवान हैं और हम गरीब हैं। भला धरती और आसमान का क्या मेल।
लड़का बोला " नहीं पिताजी मैं उनका साथ नहीं छोड़ सकता। बेशक यह घर छोड़ सकता हूं।”
बाप यह सुनकर आगबबूला हो गया और लड़के को तुरंत घर से निकल जाने की आज्ञा दे दी। लड़के ने भी राम की भांति अपने पिता की आज्ञा शिरोधार्य कर ली और सीधा अपने मित्रो के पास जा पहुंचा। उन्हें सारी बात बताई। सबने तय किया कि हम भी अपना अपना घर छोड़कर मित्र के साथ जायंगे। इसके बाद सबने अपने घर और गांव से विदा ले ली और वन की ओर चल पड़े।धीरे धीरे सूरज पश्चिम के समुन्दर में डूबता गया और धरती पर अंधेरा छाने लगा। चारों वन से गुजर रहे थे। काली रात थी। वन में तरह तरह की आवाजें सुनकर सब डरने लगे। उनके पेट में भूख के मारे चूहे दौड़ रहे थे। किसान के पुत्र ने देखा एक पेड़ के नीचे बहुत से जुगनू चमक रहे हैं।वह अपने साथियों को वहां ले गया और उन्हें पेड़ के नीचे सोने के लिए कहा। तीनों को थका मांदा देखकर उसका दिल भर गया। बोला "तुम लोगों ने मेरी खातिर नाहक यह मुसीबत मोल ली।”
सबने उसे धीरज बंधाया और कहा "नहीं नहीं यह कैसे हो सकता है कि हमारा एक साथी भूखा प्यासा भटकता रहे और हम अपने अपने घरों में मौज उड़ायें। जीयेंगे तो साथ मरेंगे तो साथ साथ।” थोड़ी देर बाद वे तीनों सो गये पर किसान के लड़के की आंख में नींद कहां उसने भगवान से प्रार्थना की "अगर तू सचमुच कहीं है तो मेरी पुकार सुनकर आ जा और मेरी मदद कर।”
उसकी पुकार सुनकर भगवान एक साधु के रूप में वहां आ गये। लड़के से कहा "मांग ले जो कुछ मांगना है। यह देख इस थैली में हीरे जवाहरात भरे हैं।”
लड़के ने कहा "नहीं मुझे हीरे नहीं चाहिए। मेरे मित्र भूखे हैं। उन्हें कुछ खाने को दे दो।”
साधु ने कहा "मैं तुम्हें राज की एक बात बताता हूं। वह जो सामने पेड़ है न आम का उस पर चार आम लगे हैं एक पूरा पका हुआ, दूसरा उससे कुछ कम पका हुआ, तीसरा उससे कम पका हुआ और चौथा कच्चा।”
"इसमें राज की कौन सी बात है" लड़के ने पूछा।
साधु ने कहा "ये चारों आम तुम लोग खाओ। तुममें से जो पहला आम खायगा वह राजा बन जायगा। दूसरा आम खाने वाला राजा का मंत्री बन जायगा। जो तीसरा आम खायगा उसके मुंह से हीरे निकलेंगे और चौथा आम खानेवाले को उमर कैद की सजा भोगनी पड़ेगी।”
इतना कहकर बूढ़ा आंख से ओझल हो गया।तड़के सब उठे तो किसान के पुत्र ने कहा "सब मुंह धो लो।” फिर उसने कच्चा आम अपने लिए रख लिया और बाकी आम उनको खाने के लिए दे दिये। सबने आम खा लिये। पेट को कुछ आराम पहुंचा तो सब वहां से चल पड़े। काफी देर तक चलते रहने से सबको फिर से भूख प्यास लग आई।रास्ते में एक कुआं दिखाई दिया। वहां राजकुमार ने मुंह धोने के इरादे से पानी पिया और फिर थूक दिया तो उसके मुंह से तीन हीरे निकल आये। उसे हीरे की परख थी। उसने चुपचाप हीरे अपनी जेब में रख लिए। दूसरे दिन सुबह एक राजधानी में पहुंचने के बाद उसने एक हीरा निकालकर मंत्री के पुत्र को दिया और खाने के लिए कुछ ले आने को कहा। वह हीरा लेकर बाजार पहुंचा ता देखता क्या है कि रास्ते में बहुत से लोग जमा हो गये हैं। गाजे बाजे के साथ एक हाथी आ रहा है।
उसने एक आदमी से पूछा "यह शोर कैसा है"
"अरे तुम्हें नहीं मालूम!" उस आदमी ने विस्मय से कहा।
" नहीं तो।”
"यहां का राजा बिना संतान के मर गया है। अब शासन चलाने के लिए कोई तो राजा चाहिए। इसलिए इस हाथी को रास्ते में छोड़ा गया है। वही राजा चुनेगा।”
"सो कैसे"
"हाथी की सूंड में वह माला देख रहे हो न, हाथी जिसके गले में यह माला डालेगा वही हमारा राजा बन जायगा। देखो वह हाथी इसी ओर आ रहा है। एक तरफ हट जाओ।”
लड़का रास्ते के एक ओर हटकर खड़ा हो गया। हाथी ने उसके पास आकर अचानक उसी के गले में माला डाल दी। इसी प्रकार मंत्री का पुत्र राजा बन गया। उसने पूरा पका हुआ आम जो खाया था। वह राजवैभव में अपने सभी मित्रों को भूल गया। बहुत समय बीतने पर भी जब वह नहीं लौटा तो यह देखकर राजकुमार ने दूसरा हीरा निकाला और साहूकार के पुत्र को देकर कुछ लाने को कहा। वह हीरा लेकर बाजार पहुंचा। राज को राजा मिल गया था पर मंत्री के अभाव की पूर्ति करनी थी इसलिए हाथी को माला देकर दुबारा भेजा गया। किस्मत की बात कि अब हाथी ने एक दुकान के पास खड़े साहूकार के पुत्र को ही माला पहनाई। वह भी मंत्री बन गया और दोस्तों को भूल गया। इधर राजकुमार और किसान के लड़के का भूख के मारे बुरा हाल हो रहा था।
फिर किसान के पुत्र ने कहा "अब मैं ही खाने की कोई चीज ले आता हूं।”
राजकुमार ने बचा हुआ तीसरा हीरा उसे सौंप दिया। वह एक दुकान में गया। खाने की चीजें लेकर उसने अपने पास वाला हीरा दुकानदार की हथेली पर रख दिया। फटेहाल लड़के के पास कीमती हीरा देखकर दुकानदार को शक हुआ कि हो न हो इस लड़के ने जरूर ही यह हीरा राजमहल से चुराया होगा। उसने तुरंत पुलिस के सिपाहियों को बुलाया। जिन्होने किसान के लड़के की एक न सुनी और उसे गिरफ्तार कर लिया। दूसरे दिन उसे उमर कैद की सजा सुना दी गई। यह प्रताप था उस कच्चे आम का।
उधर बेचारा राजकुमार मारे चिंता के परेशान था। वह सोचने लगा यह बड़ा विचित्र नगर है। मेरा एक भी मित्र वापस नहीं आया। ऐसे नगर में न रहना ही अच्छा। वह दौड़ता हुआ वहां से निकला और दूसरे गांव के पास पहुंचा। रास्ते में उसे एक किसान मिला जो सिर पर रोटी की पोटली रखे अपने घर लौट रहा था। किसानने उसे अपने साथ ले लिया और भोजन के लिए अपने घर ले गया। किसान के घर पहुंचने के बाद राजकुमार ने देखा कि किसान की हालत बड़ी खराब है। किसान ने उसे अच्छी तरह नहलाया और कहा "किसी समय मैं गांव का मुखिया हुआ करता था। रोज तीस लोगों को दान देता था, पर अब कौड़ी कौड़ी के लिए मोहताज हूं।"
राजकुमार बड़ा भूखा था उसे जो रूखीसूखी रोटी मिली उसे खा पीकर सो गया। दूसरे दिन सुबह उठने के बाद जब उसने मुंह धोया तो फिर मुंह से तीन हीरे निकले। वे हीरे उसने किसान को दे दिये। किसान फिर धनवान बन गया। राजकुमार वहीं उनके रहने लगा और किसान भी उससे पुत्रवत् प्रेम करने लगा। किसान के खेत में काम करने वाली एक औरत से यह सब देखा नहीं गया। उसने एक वेश्या को सारी बात सुनाकर कहा "उस लड़के को भगाकर ले आओ तो तुम्हें इतना धन मिलेगा कि जिन्दगी भर चैन की बंसी बजाती रहोगी।”
अब वेश्या जा पहुंची किसान के घर और कहने लगी "मैं इसकी मां हूं। यह दुलारा मेरी आंखों का तारा है। मैं इसके बिना कैसे जी सकूंगी इसे मेरे साथ भेज दो।” किसान को उसकी बात जंच गई। राजकुमार भी भुलावे में आकर उसके पीछे पीछे चल दिया। घर आने पर वेश्या ने राजकुमार को खूब शराब पिलाई। उसने सोचा लड़का उल्टी करेगा तो बहुत से हीरे एक साथ निकल आयंगे। उसकी इच्छा के अनुसार लड़के को उल्टी तो हो गई, लेकिन हीरा एक भी नहीं निकला। क्रोधित होकर उसने राजकुमार को बहुत पीटा और उसे किसान के मकान के पीछे एक गडढे में डाल दिया। राजकुमार बेहोश हो गया था। होश में आने पर उसने सोचा अब किसान के घर जाना ठीक नहीं होगा इसलिए उसने बदन पर राख मल ली और संन्यासी बनकर वहां से चल दिया। रास्ते में उसे एक रस्सी पड़ी हुई दिखाई दी। जैसे ही उसने रस्सी उठाई वह अचानक सुनहरे रंग का तोता बन गया।
तभी आकाशवाणी हुई "एक राजकुमारी ने प्रण किया है कि वह सुनहरे तोते के साथ ही ब्याह करेगी।”अब तोता मुक्त रूप से आसमान में उड़ता हुआ देश विदेश की सैर करने लगा। होते होते एक दिन वह उसी राजमहल के पास पहुंचा जहां की राजकुमारी दिन रात सुनहरे तोते की राह देख रही थी और दिनों दिन दुबली होती जा रही थी। उसने राजा से कहा "मैं इस सुनहरे तोते के साथ ही ब्याह करूंगी।”
राजा को बड़ा दुख हुआ कि ऐसी सुन्दर राजकुमारी एक तोते के साथ ब्याह करेगी पर उसकी एक न चली। आखिर सुनहरे तोते के साथ राजकुमारी का ब्याह हो गया। ब्याह होते ही तोता पुन: अपने राजकुमार वाले रूप में बदल गया। यह देखकर राजा तो खुशी से झूम उठा। उसने अपनी पुत्री को अपार सम्पत्ति नौकर चाकर घोड़े-हाथी औरआधा राज्य भी भेंट स्वरूप दे दिया। नये राजा रानी अपने घर जाने निकले। 

अब राजकुमार को अपने मित्रों की याद आई। उसने पड़ोस के राज्य की राजधानी पर हमला करने की घोषणा की पर लड़ाई आरंभ होने से पहले ही उस राज्य का राजा अपने सरदारों सहित राजकुमार से मिलने आया। उसने अपना राज्य राजकुमार के हवाले करने की तैयारी बताई। राजा की आवाज से राजकुमार ने उसे पहचान लिया और उससे कहा "क्यों मित्र तुमने मुझे पहचाना नहीं"
दोनों ने एक दूसरे को पहचाना तो दोनों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। अब दोनों ने मिलकर अपने साथी किसान के पुत्र को खोजना आरम्भ किया तो पता चला कि वो तो कारावास में बंद उम्रकैद की सजा भुगत रहा है। राजकुमार को यह बात खलने लगी कि उसकी खातिर मित्र को इतना कष्ट भुगतना पड़ा।किसान के पुत्र को कारागार से मुक्त कराया गया । सब फिर से इकट्ठे हो गए।इसके बाद सबने अपनी अपनी सम्पत्ति एकत्र की और उसके चार बराबर हिस्से किए। सबको एक एक हिस्सा दे दिया गया। सब अपने गांव वापस आ गये और सपरिवार सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे।